नरेन्द्र बाबू बेगार महकमे में कई वर्ष बेगार ढोने के बाद किसी तरह देहली में नौकरी तो पा सके, मगर सिर छिपाने को मकान न पा सके। आखिर दिल्ली से तेरह मील दूर गाजियाबाद में रहने को विवश हुए। जनरल ड्यूटी में प्रातः साढ़े सात से साढ़े ग्यारह और दोपहर दो से साढ़े पाँच बजे तक खटने के लिए मुँह अंधेरे ही बेचारे ट्रेन से दिल्ली जाते, तो बच्चे सोए हुए रहते और रात को जब नौ-दस बजे वापस आते, तब तक बच्चे सो जाते। इतवार की छुट्टी वाले रोज ही बच्चों से हँस-बोलकर जी बहलाने का अवसर मिलता।
इसी तरह दिल्ली-गाजियाबाद के चक्कर कोल्हू के बैल की तरह काटते हुए दिन गुजर रहे थे, कि एक रोज ड्यूटी पर एकाएक तबीयत खराब हो जाने की वजह से दिन में ही घर वापस आना पड़ा। बड़ा बच्चा स्कूल गया हुआ था। दरवाजे पर दस्तक सुनकर पत्नी ने छोटे बच्चे को भेजा ताकि वह दरवाजा खोलकर मालूम करे कि आगन्तुक कौन है? बच्चे ने दरवाजा खोलकर देखा तो बोला, "माँ, इतवार वाले बाबूजी आए हैं।"
-अयोध्याप्रसाद गोयलीय
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