बहुत पुराने संबंध हैं कबूतरों से मेरे,
हो सकता है इस चराचर जगत में
सबसे पहले मेरी दोस्ती कबूतरों से ही हुई हो।
यह तो तय है उन दिनों
मैं बहुत कम जानता था कबूतरों के बारे में,
उनकी गुटरगूँ और गर्दन फुलाकर गोल-गोल घूमना
मुझे हैरान कर देता था।
मेरे घर और स्कूल की छतों पर
अनगिनत सलेटी-काली धारियों वाले कबूतर टहलते थे।

नवम्बर के महीने में
अखबार में छपता था जवाहरलाल नेहरू का चित्र—
सफेद कबूतर उड़ाते हुए।
हम मास्टर जी से पूछते थे,
पंडित जी के कबूतर 
हमारे कबूतरों जैसे सलेटी क्यों नहीं हैं?
मास्टर जी गौर से देखते थे नेहरू जी की तस्वीर और कहते थे,
उनका गुलाब भी तो
हमारे गुलाबों से ज़्यादा लाल है बच्चो!
मास्टर जी की बात समझ आती, इससे पहले
स्कूल की घण्टी बज जाती और सारे कबूतर उड़ जाते।

हम बड़े हुए तो कबूतर भी समझदार होने लगे।
हम उनसे और वे हमसे
लुकाछिपी का खेल खेलने लगे।
वे कभी कूलर पर अंडा छोड़ जाते,
तो कभी चिमनी की डक्ट पर।
उन्हें भगाते-भगाते हम थक जाते।
हम कबूतरों से वैसे ही डरने लगे,
जैसा हम डरते हैं अपने चुने हुए नेताओं से।

कबूतर हमारी झाड़ू की सींखों से लेकर
ऊन की लच्छियाँ तक
उठा ले जाते अपने घोंसलों में,
जहाँ उनके बच्चे
नए कबूतर बनने की तैयारी में जुटे होते।
उनकी बीटों और बदबू से परेशान हो जाते हम।
कबूतर बन्दर भी नहीं थे कि उन्हें भगाने के लिए
हम मँगवा लेते कोई लंगूर।
वे दिन भर झगड़ते और शोर मचाते।
कबूतरों के लिए तो जैसे संसद ही था हमारा घर,
वे असली मालिक बन जाते और हम
बैठकर अगले चुनाव का इंतज़ार करते।

इस सवाल का कभी सही जवाब नहीं मिला हमें—
कि हमारे कबूतर हमेशा सलेटी और मटमैले ही क्यों रहे?
हम उनसे परेशान होकर भी
क्यों उन्हें पनाह दिए हुए थे अपने घर में?

बहुत तेज़ी से बदले कबूतरों ने रंग,
अब हमारे घर में मिलजुल कर उधम मचाते हैं
कई रंगों के कबूतर।
कुछ टोपी पहनकर, तो कुछ मफ़लर लपेटकर।
लगता है इकट्ठा होकर आ गए हैं
नेहरू जी के छोड़े हुए सभी कबूतर;
जिस शांति की खोज में उन्हें छोड़ा गया था,
वह कहीं थी ही नहीं।

बहुत पुराने संबंध हैं कबूतरों से मेरे,
हो सकता है इस चराचर जगत में
सबसे पहले मेरी दोस्ती कबूतरों से ही हुई हो!

- राजेश्वर वशिष्ठ
(संग्रह: प्रजातंत्र में कबूतर से)