देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
दूसरा रूप | कविता
जो किसी सोच पर बैठ जाता है और उड़ नहीं सकता
वह मर चुका है
ज़िंदा नहीं
ऐ ज़िंदगी!!!
पेड़ कभी शांत नहीं होते
हवा पेड़ों को बदल सकती है लेकिन रुक नहीं सकती
जब कोहरा गहरा और गहरा होता है
तूफ़ान अपनी कमर कस लेता है
मरे हुए लोग समझ जाते हैं
कि
अब हर जगह शांति है
वे सोच भी नहीं सकते
कि
तूफ़ानी हवा कभी भी सब कुछ तबाह कर सकती है
वे कभी हार नहीं मानते।
और
मैं
हवा का दूसरा रूप हूँ
पंजाबी से अनुवाद- आचार्य राजेश कुमार

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