देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

उलाहना

भारत-दर्शन हिंदी साहित्यिक पत्रिका

 

दिया अंधेरी रातें मुझको 
शुभ्र चांदनी और किसी को, 
यही तुम्हारा दान; 
प्राण मैं समझ गया हूँ!

तुम रूठो मैं खूब मनाऊँ 
मैं रूठूं तो मूर्ख कहाऊँ, 
यही तुम्हारा मान; 
प्राण मैं सुलझ गया हूँ!

तुम चाहो जो करो भला है 
मेरी सभी कला विकला है, 
यही तुम्हारा ध्यान; 
प्राण मैं उलझ गया हूँ!

सभी तरह अधिकार तुम्हारा 
मेरे लिए न शेष सहारा, 
यही स्नेह संधान, 
प्राण मैं बिलझ गया हूँ!

       [1948]

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।