अजी सुनिए, मैं कविता हूँ!
रायता बन पसरने लगी हूँ,
बिन मौसम बरसात-सी,
बेवक़्त बरसने लगी हूँ।
कभी सोने-सी दुर्लभ,
अब ढाई मन भाव बिकने लगी हूँ,
दिखावे के चिकने खंभों पर,
पैर डाल टिकने लगी हूँ।
आप कवि कैसे भी हों,
बस लिखते जाइए
मंचों पर बढ़-चढ़कर,
साझा करने आइए।
कोरोना के जैसे
कविता का हाल है
घुलती फ़िज़ाओं में
श्रोता बेहाल है।
लेखन की धारा यह
बहती ही जा रही
कुछ भी लिख लीजिए
सब कविता कहला रही।
मुफ़्त की यह खिचड़ी
बँट रही सब ओर है,
लूट सको लूट लो
मच रहा यही शोर है।
कहते हैं लेखन का
स्वर्णिम यह दौर है,
दौड़ रहे सब मगर
दिखना न ठौर है।
दिखने के लिए
सब लिखने लगे हैं,
दिखावे की चक्की में
सब पिसने लगे हैं।
बोली के बाज़ार में
ख़ामोशी हुई कम
कविता के मैदान में
सब दिखा रहे दम।
लिखते थे मन से
मन सबके बैचेन हैं,
किसे सुनें, किसे पढ़ें
कम पड़ते दिन-रैन हैं।
कहीं लगा मेला है
कहीं छाया सन्नाटा
श्रोता भी तो नफ़ा देखें
क्यों सहें वे घाटा?
न्यौता निभाने की
रीत पुरानी है
लाइक, कमेंट करो भाई
कल अपनी बारी आनी है।
सोशल की नगरी में
पाँव रखो थम कर
हाज़िरी लगाओ
पीटो ताली जम-जम कर।
कविता की मीनमेख
क्यों निकालें भाई
वाहवाही में कहाँ
ख़र्च होता पाई!
रेत-सी है बिखरी
और ढूँढ़ रहे मोती हो
किंडल के युग में
तुम ढूँढ रहे पोथी हो!
उम्र और अनुभव की
बात लगती थोथी है,
दादी संग काव्य-पाठ
कर रही पोती है।
कविता के लेखन पर
किसका चला ज़ोर है?
भावना की मेघ
उमड़ रही घनघोर है।
मन के आकाश में
मचा रही शोर है,
गटक सको गटक लो
यह कविता का झोर है।
कविता और कवियों में
मची हुई होड़ है,
धीरज की दवा ही
इस मर्ज़ की तोड़ है।
पिसती है कविता और
कवि मालामाल हैं
कुछ औसत, कुछ बेहतर
और कुछ तो कमाल हैं।
पढ़कर-सुनकर कविताएँ
गुज़र रहा साल है
पुस्तकों की बाढ़ से
पाठक बेहाल हैं।
-आराधना झा श्रीवास्तव, सिंगापुर