कहते हैं लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा होता है। किताबों में यह वाक्य इतना सुंदर लगता है कि लगता है जैसे किसी आदर्श लोक की कहानी पढ़ रहे हों। पर ज़मीनी हकीकत में लोकतंत्र का एक और अदृश्य, मगर सबसे शक्तिशाली स्तंभ है— कुर्सी। यह कुर्सी साधारण फर्नीचर नहीं, बल्कि तपस्या का फल, महत्वाकांक्षा का केंद्र और जनसेवा का घोषित प्रतीक है। फर्क सिर्फ इतना है कि जनसेवा का मार्ग अक्सर कुर्सी से शुरू होकर कुर्सी पर ही समाप्त हो जाता है।

चुनाव का मौसम आते ही देश में एक अद्भुत परिवर्तन दिखाई देता है। जो नेता पाँच साल तक जनता से ऐसे दूर रहते हैं जैसे विद्यार्थी गणित की किताब से, वे अचानक हर गली, हर चौपाल और हर दरवाज़े पर दिखने लगते हैं। उनके चेहरे पर विनम्रता की ऐसी आभा होती है मानो वे वर्षों से जनता के दुख-दर्द में डूबे रहे हों। हाथ जोड़ते-जोड़ते उनकी कलाई दुखने लगती है, मगर सेवा का जोश कम नहीं होता। वे कहते हैं— “हम तो आपके सेवक हैं।” जनता मन ही मन सोचती है— “अगर ये सेवक हैं, तो मालिक की हालत ऐसी क्यों है?”

घोषणापत्र आज के समय की सबसे रचनात्मक साहित्यिक विधा बन चुका है। इसमें सपनों की ऐसी रंगीन बुनाई होती है कि अलादीन का चिराग भी ईर्ष्या करने लगे। हर समस्या का समाधान “तुरंत”, “शीघ्र” और “प्राथमिकता के आधार पर” करने का वादा किया जाता है। बेरोज़गारी मिटेगी, महंगाई घटेगी, सड़कें चमकेंगी, अस्पतालों में दवा मुफ्त मिलेगी, और युवाओं को अवसरों की बारिश होगी। जनता हर बार इन शब्दों को पढ़ती है और सोचती है— “शायद इस बार सच हो जाए।” पर पाँच साल बाद वही शब्द फिर नई जिल्द में लौट आते हैं।

राजनीति में विचारधारा का महत्व कभी हुआ करता था। अब विचारधारा लचीली रबर की तरह हो गई है, जिसे जरूरत के अनुसार खींचा या मोड़ा जा सकता है। दल बदल अब अपराध नहीं, बल्कि रणनीति कहलाता है। नेता जी सुबह तक एक दल में होते हैं, दोपहर तक दूसरे में, और शाम को प्रेस वार्ता में कहते हैं— “मैंने यह कदम राष्ट्रहित में उठाया है।” राष्ट्र चकित रह जाता है कि उसका हित इतना चंचल कैसे हो गया।

चुनावी रैलियाँ लोकतंत्र के मेले होते हैं। मंच पर भाषण, नीचे तालियों की गूंज, और बीच-बीच में नारेबाज़ी की गूंज। मंच से शब्दों की आतिशबाज़ी होती है— इतनी तेज़ कि कभी-कभी सच की आवाज़ दब जाती है। हर नेता स्वयं को परिवर्तन का प्रतीक बताता है। हर दल खुद को भविष्य का निर्माता घोषित करता है। जनता भीड़ में खड़ी होकर सुनती है, ताली बजाती है, और अंत में घर लौटकर सोचती है— “परिवर्तन आखिर आएगा कब?”
चुनाव के दौरान सादगी का प्रदर्शन भी एक कला है। नेता जी अचानक सादा कपड़े पहनने लगते हैं, साधारण घरों में भोजन करते हैं, बच्चों को गोद में उठाकर फोटो खिंचवाते हैं। कैमरे के सामने उनकी मुस्कान इतनी निर्मल होती है कि लगे जैसे वे त्याग और तपस्या के पर्याय हों। मगर कैमरे के पीछे की कहानी अक्सर अलग होती है।

सबसे रोचक दृश्य परिणाम आने के बाद का होता है। जो जीतते हैं, वे कहते हैं— “यह जनता की जीत है।” जो हारते हैं, वे कहते हैं— “जनता हमें समझ नहीं पाई।” जनता दोनों वक्तव्यों को सुनकर चुप रहती है, क्योंकि उसे अगले पाँच साल तक फिर से समझाया जाना है।

लोकतंत्र में जनता को मालिक कहा जाता है। पर व्यवहार में जनता उस मेहमान की तरह है जिसे हर पाँच साल में बड़े आदर से बुलाया जाता है, मीठी बातें सुनाई जाती हैं, और फिर विदा कर दिया जाता है। चुनाव के बाद वही सड़कें, वही समस्याएँ, वही शिकायतें फिर सामने खड़ी मिलती हैं।

कुर्सी का आकर्षण इतना प्रबल है कि उसके लिए पुराने विरोधी भी नए मित्र बन जाते हैं। गठबंधन की राजनीति में सिद्धांतों की जगह समीकरण ले लेते हैं। कल तक जो एक-दूसरे पर आरोप लगाते थे, आज साथ बैठकर मुस्कुरा रहे होते हैं। इसे राजनीतिक परिपक्वता कहा जाता है। जनता इसे परिस्थितियों की मजबूरी समझकर स्वीकार कर लेती है।

मीडिया भी इस उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चुनाव के समय बहसों की बाढ़ आ जाती है। हर चैनल पर विश्लेषण, सर्वेक्षण और भविष्यवाणी होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हवा किस दिशा में बह रही है। मगर हवा की दिशा बदलते देर नहीं लगती। परिणाम आने पर कई विश्लेषण नए अर्थों में समझाए जाते हैं।

युवा मतदाता हर चुनाव में आशा का नया अध्याय खोलते हैं। वे बदलाव की बात करते हैं, पारदर्शिता की मांग करते हैं और सवाल पूछते हैं। राजनीतिक दल भी युवाओं को अपने घोषणापत्र में विशेष स्थान देते हैं। पर चुनाव के बाद युवा फिर वही पुराने ढर्रे को देखकर निराश हो जाते हैं। फिर भी अगली बार वे फिर उम्मीद लेकर खड़े होते हैं— यही लोकतंत्र की खूबसूरती और विडंबना दोनों है।

महंगाई पर हर दल चिंता जताता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हर नेता कठोर कार्रवाई का वादा करता है। पारदर्शिता, सुशासन और विकास जैसे शब्द इतने अधिक दोहराए जाते हैं कि वे नारे बनकर रह जाते हैं। जनता सोचती है— “अगर सब इतने ईमानदार हैं, तो समस्या आखिर है कहाँ?”

कभी-कभी लगता है कि लोकतंत्र एक विशाल रंगमंच है। नेता अभिनेता हैं, जनता दर्शक है, और कुर्सी मुख्य पात्र है। पटकथा हर बार थोड़ी बदल जाती है, मगर कहानी का मूल भाव वही रहता है। संघर्ष कुर्सी के लिए है, संवाद जनता के नाम पर हैं, और तालियाँ उम्मीद की गूंज हैं।

फिर भी लोकतंत्र की ताकत यही है कि जनता के पास विकल्प है। वह चाहे तो कुर्सी हिला सकती है। यही डर और यही आशा व्यवस्था को जीवित रखते हैं। व्यंग्य इसी जीवंतता का प्रमाण है। जब समाज हँसते हुए सवाल पूछता है, तो सत्ता को आईना दिखता है।
शायद किसी दिन कुर्सी सच में सेवा का प्रतीक बने। शायद घोषणापत्र केवल कागज न रह जाए, बल्कि कार्ययोजना बन जाए। शायद जनता को हर पाँच साल में याद करने की जरूरत न पड़े, क्योंकि वह हर दिन केंद्र में हो।

तब तक, लोकतंत्र अपनी यात्रा पर है— उम्मीद और विडंबना के बीच संतुलन बनाते हुए। कुर्सी स्थिर है, मगर जनता की नज़र उस पर टिकी हुई है। और यही नज़र लोकतंत्र की असली शक्ति है।

-वीणा सिन्हा 
संपादक: द पब्लिक,हिन्दी मासिक पत्रिका 
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