भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।

दोराहा | लघुकथा

दोराहा | लघुकथादोराहा लघुकथा :  रोहित कुमार 'हैप्पी'

मैं दोराहे पर खड़ा था और वे दोनों मुझे डसने को तैयार थे। एक तरफ साँप था और दूसरी तरफ आदमी।

मैंने ज्यादा विचारना उचित नहीं समझा। सोचा साँप शायद ज़हरीला न हो या शायद उसका डंक चूक जाए लेकिन आदमी से तो मैं भली-भाँति परिचित था।

...और मैं साँप वाले रास्ते की ओर बढ़ गया।

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 1

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Neel Mani mail2neelmani@gmail.com
15-Jul-2026 06:25
दोनों लघु कथाएं सचेत करती हुई - आदमी ओर व्यवस्था पर कटाक्ष।
दो राहा व पेश-बंदी रोचक।

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