वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।

दोराहा | लघुकथा

दोराहा | लघुकथादोराहा लघुकथा :  रोहित कुमार 'हैप्पी'

मैं दोराहे पर खड़ा था और वे दोनों मुझे डसने को तैयार थे। एक तरफ साँप था और दूसरी तरफ आदमी।

मैंने ज्यादा विचारना उचित नहीं समझा। सोचा साँप शायद ज़हरीला न हो या शायद उसका डंक चूक जाए लेकिन आदमी से तो मैं भली-भाँति परिचित था।

...और मैं साँप वाले रास्ते की ओर बढ़ गया।

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