काफी सोच-विचार के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची हूं कि मुझे अपने कुछ महत्वपूर्ण पूर्वजन्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कर ही देना चाहिए। सब ‘चुके हुए’ रचनाधर्मी ‘आत्मकथा’ ही लिखते नज़र आते हैं। इसलिए मैं पूर्वजन्मों की कथा लिखूंगी, उन सबसे एक कदम बढ़कर। यों भी मेरा अपना अनुभव है कि ‘सुर्खियों’ में आने के लिए मात्र एक जन्म के ‘गॉसिप्स’ या स्कैंडल्स नाकाफी होते हैं, जब तक ये सब प्रचुर मात्रा में न हों, सारी लिखा-पढ़ी बेकार। इसलिए मेरे लिए पूर्वजन्मों की गुफाओं में सेंध लगाना कुछ जरूरी-सा हो गया है।

वैसे कहने को तो मैं अपने पति से हमेशा यही कहती हूं कि मैं जन्म-जन्म से ही उन्हीं के साथ हूं, और वे भी इसे मानते हैं कि मैं कई जन्मों से उनके पीछे हाथ धोकर पड़ी हूं, लेकिन ये सब मौखिक वक्त्वय है; लिखते समय तो मैं सच के सिवा कुछ नहीं लिखूंगी। सब कुछ निखालिस प्रमाणिक, इसलिए और भी क्योंकि लिखते समय मुझे अपने पति का बिलकुल डर नहीं रहता। कारण यह है कि एक तो उनके लिए मेरे रचे साहित्य का काला अक्षर भैंस बराबर है, दूसरे उनकी अक्ल भी उनकी नज़र में भैंस से काफी बड़ी है। इस तरह मेरे रचनाधर्म और उनकी अक्ल का यह योग तमाम अनिष्टकारी ग्रहों के बावजूद बड़े शुभ स्थान में बैठा है।

और इसी अक्ल के बल पर उन्होंने मेरे पूर्वजन्मों के बहुत सारे तथ्य समय-समय पर खोलने की धमकी दे डाली है। घर-परिवार के और भी बहुत से जिज्ञासु मेरे पूर्वजन्मों का रहस्य खोलते रहते हैं। उदाहरण के लिए, हर चीज सूंघकर फौरन पहचानने वाली मेरी आदत को देखकर कहा गया है- ‘तुम जरूर किसी जन्म में शिकारी कुत्ता थीं’- (ईश्वर उन्हें कभी सच न बुलवाएं) और गर्दन की सुराही हमेशा आसमान की ओर उठाए रखने तथा बगैर पानी पिए भी आराम से काफी समय गुजार देने की वजह से सुनना पड़ता है- ‘उधर जोधपुर की कोई ऊंटनी मरी और इधर तू पैदा हुई।’

पर सच्चाई यह है कि तमाम आमोखास की तरह मैं भी उद्भिज, स्वदेज, अंडज और जरायुज आदि जन्मों के क्यू में लगते-लगते ही इस मानुष जन्मवाली नौबत को आन पहुंची हूं। उनमें से कुछ जन्मों की बड़ी मधुर यादें हैं। उदाहरण के लिए, जब कभी हरे-भरे चरागाह देखती हूं, अपने भेड़वाले जन्म की स्मृति कचोट जाती है। आह! क्या दिन थे- बस घुर्र-घुर्र करते संगी-साथियों के साथ चरते चले जाना, चरते चले जाना- चारों तरफ ताजा, हरा-भरा लंच तैयार; न दीन की फिक्र, न दुनिया की; न कुछ सोचने-समझने वाला सिंड़ा-सा माहौल! चरना और चरना, और सबके साथ कुएं में कूद पड़ना। कूदते समय भी वही रचनेवाला उत्साह एक साथ, यह नहीं कि पहले तुम, पहले तुम...

कुछ इसी से मिलती-जुलती स्मृति ‘घुन’ वाले जन्म की है। न राशन का झंझट, न राशन कार्ड का। छिलका रहित साफ गेहूं का मैदा गेहूं में से कुतरती जाती थी। वही भोजन, वही वस्त्र, वही आवास। आज तक मनुष्य इन तीनों समस्याओं का एक निदान नहीं ढूंढ़ पाया है, जो अदने से घुनों ने ढूंढ़ निकाला। जितना इच्छा हो, खाना और खाने से बची जगह में आराम से पसर जाना। बस, यही था कि अकसर गेहूं के साथ पिस जाना पड़ता था। सो क्या अब इस जन्म में नहीं पिसते?

अब आपसे क्या छुपाना? एक जन्म में नागिन भी थी। यह जिंदगी सबसे ज्यादा शानदार और आन-बानवाली थी। बिल में लेटी-लेटी ही जरा किसी ने जरूरत से ज्यादा बदतमीजी की नहीं कि वहीं फन काढ़कर दूध-का-दूध पानी-का पानीवाला न्याय कर दिया। कोई आयोग बिठाने का पाखंड करने की जरूरत नहीं। कितने जानी दुश्मनों को डंसा; अब तो बस उसकी यादें ही शेष हैं। सच कहती हूं, उस तुलना में यह मनुष्य जन्म दो कौड़ी का है, बंधु! जिसे डंसना चाहो डंस न सको, जिसकी थुड़ी करना चाहो उसकी विरुदावली गानी पड़े- इससे अधिक विडंबना और क्या हो सकती है? मैंने उस जन्म में कई सांपों को कहते सुना था, ‘अरे, सांप तो बस सांप होते हैं, लेकिन आदमी आस्तीन का सांप है।’ मैं तो तहेदिल से चाहती हूं कि ईश्वर एक बार और सांपवाला जन्म दे देता तो इधर के कई जन्मों का जमा हुआ हिसाब चुकता हो जाता।

लोमड़ी वाले जन्म को ही लीजिए। वही खट्टे अंगूरवाली; वह लोमड़ी मैं ही थी। इतनी उछली, हाथ-पांव मारे, एक भी अंगूर मुंह में नहीं टपका। यों यह गुजरता सबके साथ है, पर बदनाम मैं ही हो गयी- कि अंगूर खट्टे हैं। आप बताइए, मीठे भी कैसे कहती? चखे थे क्या? ग़म गलत करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है? फिर आदमियों की तरह नहीं कि बगैर चखे ही हांकने लगूं- वाह, कया कहने! बजार में कब के आ गये हैं, डेढ़ सौ रूपये किलो, अभी कल ही अंगूर का शरबत पिया।

याददाश्त थोड़ी कमजोर पड़ रही है इन दिनों, नहीं तो आपको अपनी ‘मेंढकी’ और ‘तोती’ वाले जन्मों के भी संस्मरण सुनाती। आह! मेंढकीवाले जन्म में जी भरकर टरटराती रहती थी, कितना कुछ पर कोई रोकनेवाला नहीं रहता था। जो चाहे टर्राओ, जितना चाहो टर्राओ, पति-प्रतिबंधक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं... लॉंग जंप के भी कितने ही ओलम्पिक रिकॉर्ड थोड़े थे... हर समय पैंतरेबाजी के लिए तैयार... वे दिन भी क्या दिन थे! सिर्फ कभी-कभी जुकाम हो जाया करता था।

यों मुझे कोयलेवाले जन्म का भी ऑफर मिला था। लेकिन एक तो रंगभेद नीति का परिणाम अपनी आंखों देख चुकी थी मनुष्यों के समाज में, दूसरे मैं कई जन्मों से आधुनिक मानसिकतावाली रही हूं, सो तोती होना ज्यादा पंसद आया था। हरी-भरी साड़ी और चोंच पर ढेर सारी लिपिस्टक थोपे आम-अमरूद का फ्रूट-सलाद कुतरती रहती थी।

ठहरिए, अचानक मेरे मस्तिष्क में एक विचार कौंधा है। मैं अपने पूर्वजन्मों से हटकर अब यह जानना चाहती हूं कि मेरे पति उस जन्म में क्या थे? मेरी पड़ोसिन उस जन्म में क्या थी, मेरे संपादक, प्रकाशक और समीक्षक भी। क्योंकि मुझे शक़ पड़ गया है कि ये सब-के-सब मुझसे पिछले कई जन्मों की दुश्मनी निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

- सूर्यबाला