हे देवि! आपकी शादी की  42वीं सालगिरह मुबारक हो। मेरे बुजुर्ग बताते हैं कि उसी दिन और उसी साल मेरी भी शादी हुई थी और आप ही के गांव में। अब मुझे भी थोड़ा-थोड़ा याद आ रहा है – अरे हां, मेरी शादी आप ही से तो हुई थी! उस दिन शाम की पाली में मेरी परीक्षा थी। परीक्षा होने के तुरंत बाद मुझे पिक करने के लिए गेट पर कार खड़ी थी, ताकि बरात जाने में विलम्‍ब न हो। यकीन कीजिए, जीवन में पहली बार मुझे लगा कि मैं जवाहरलाल नेहरू हूँ और मेरे पिताश्री मोतीलाल नेहरू हैं। कार में तो खैर मैं पहले भी बैठ चुका था, लेकिन बाप के पैसे से, वो भी इतनी इज्‍ज़त के साथ... यह पहला मौका था जो आपके कारण ही नसीब हुआ। शादी का दिन नहीं होता तो और दिनों की तरह घर पहुंचते ही मुझे थ्रेशिंग मशीन के पास गेहूं की मड़ाई के लिए खड़ा कर दिया जाता। मैं ऊंघते हुए डांठ लगाता, नीचे गेहूं और कुछ दूरी पर भूसा गिरता और मैं खुद को मनोज कुमार समझकर मन ही मन गुनगुना रहा होता – मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरे-मोती, मेरे देश की धरती। बिजली की मोटर, थ्रेशिंग मशीन, पुली और उस पर चढ़े पट्टे की खटर-पटर, हुर्र-हुर्र, कंपन और थरथराहट पार्श्‍व-संगीत का काम करते।   

तुम्‍हें पता है, पेपर देकर जैसे ही बाहर निकला, तुम्हारे जेठश्री मुझ पर बरस पड़े – सारे लड़के कब के बाहर आ गए... आज तुम्हारी शादी थी, थोड़ा पहले नहीं निकल सकते थे? अब उनको मैं कैसे समझाता कि भाई जान, थोड़ा पहले निकलने का मतलब होता कि मैं अपनी पूरी जिंदगी जिले से तो छोड़ो, अपने गांव से भी बाहर नहीं निकल पाता और मेरे देश की धरती का गुणगान करता रह जाता। अभी तक कोई पूछता था कि कौन सी यूनिवर्सिटी से पढ़े हो, तो मैं सुविधानुसार बीएचयू या इलाहाबाद कहता था। अब तुम्हारे और तुम्हारे योगीजी की वजह से चौड़ा होकर सच बोलने लायक हो गया हूँ कि मैंने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। 

मैं उस वक्त शादी के पक्ष में नहीं था, पर तुम्हारे जेठश्री और श्‍वसुरश्री के डर से मैं शादी करने जा रहा था। तालिबानियों और आइसिस वालों के आगे किसकी मर्जी चली है? बस मैंने ये शर्त रख दी थी कि जिस गाड़ी पर फलां वेड्स फलां का पोस्टर चिपका होगा, उस पर मैं हरगिज़ नहीं जाऊंगा। बेवकूफी भी करो और उसका ढिंढोरा भी पीटो, मैं इसके पक्ष में नहीं था😂। इसलिए सारी गाड़ियों पर स्टिकर चिपके थे, सिर्फ मेरी कार कुंवारी थी। आपको याद होगा, उसी दिन आपकी एक सहेली की भी बारात आनी थी जिसका घर गांव की शुरुआत में ही था। बारात तो उसकी भी आ चुकी थी, लेकिन बाइक की जिद पर अड़ा दुल्‍हा नहीं आया था। बारात आपकी भी आ चुकी थी, लेकिन मेरे पेपर की वजह से मैं नहीं पहुंचा था। मेरे घर से सारे लोग जा चुके थे, मेरी कार में मेरे साथ मेरा नाई और मेरा भतीजा बैठा था। अब आगे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘नौका डूबी’ जैसा कुछ होने वाला था। 

जैसे ही मेरी कार तुम्हारी सहेली के घर के सामने पहुंची, चार-पांच मुस्टंडे मेरी अगवानी को आ गए और मुझे कार से नीचे उतार लिया। उन्हें ये गलतफहमी थी कि डॉक्टर साहब वाली बारात पर तो हर गाड़ी पर पोस्टर चिपके हैं, ये बिना पोस्टर वाली कार है तो यही वो लड़का है जो हमारी बहन से शादी करने आया है। आनन-फानन में लोग मेरी मिजाजपुर्सी के लिए मेरे चारों तरफ खड़े हो गए। उनका नाई पंखा झलने लगा, हमें जलपान कराया गया। आपके जेठश्री जो अपनी बाइक पर हमें सिर्फ इसलिए फालो कर रहे थे कि मैं कहीं रास्‍ते में उतरकर चंपत न हो जाऊं, रास्‍ते में पान-सिगरेट के लिए चंद मिनट के लिए कहीं रुक गए और मेरा अपहरण हो गया। किसी तरह उन लोगों गलतफहमी दूर की गयी और मेरा कारवां शीरीं को छोड़कर लैला के घर की ओर रवाना हुआ। मैं आज तक खुद को तुम्हारी उस सहेली का गुनाहगार मानता हूँ। बेचारी का दुल्‍हा बाइक के लिए रूठा बैठा था और वो मन ही मन गा रही होगी – रूठे-रूठे पिया, मनाऊं कैसे और इसी बीच शोर हुआ कि लड़का आ गया; तो वो कितनी खुश हुई होगी। फिर जब उसे पता चला होगा कि उसके भाई किसी और का सुहाग उठा लाए थे, तो उसे कितनी पीड़ा हुई होगी? मुझे यकीन है, जब मैं उसके दरवाजे से जाने लगा, तो वो रो-रोकर यहीं गा रही होगी- न जाओ सइयां छुड़ा के बंहिया क़सम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी। मगर क्‍या करता? न आता तो रो-रोकर तुम्हारा बुरा हाल हो जाता और तुम्हारी सहेली के उस नालायक वर को जब अपनी वधू की परवाह नहीं थी तो वो तुम्हारे आंसू पोंछने तो आने से रहा।

तो देवि देखा आपने, कि आपके लिए मैंने कितनी बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी हैं? और बदले में मुझे मिला क्‍या – 11 साले। वो भी ऐसे-वैसे नहीं, कसकर खांस भर दें तो सामने वाले की चड्ढी आगे से गीली और पीछे से पीली हो जाए! जब हम दिल्ली आए तो 4-6 साले हमेशा मेरे दाएं-बाएं रहते थे। उबकर मैंने उन्हें एक्‍सपोर्ट करना शुरू कर दिया – अल-एन, अजमान, अबू धाबी, दुबई, शारजाह, रसाल खेमा, जेद्दा। जब उधर हाउस फुल हो गया तो एक को तो पाकिस्‍तान एयरलाइंस पर लादकर इस्लामाबाद भेज दिया था। अब तुम्हारी भाभियों के भाई भी तुम्हारे भाई बनकर आने लगे, उन्हें भी एक्‍सपोर्ट किया, तमाम को घरेलू मार्केट में भी खपाया। आज मैं दावे से कह सकता हूँ कि भारत में मैं सालों का सबसे बड़ा एक्‍सपोर्टर और सप्लायर हूँ। सरौनी से शारजाह तक, केराकत से क़तर तक, गाजियाबाद से ग़ाजापट्टी तक, यहां तक कि पोंटासाहब से पुणे तक मैं कहीं भी जाऊं, आपका कोई न कोई भाई मेरी अगवानी को जरूर मिल जाता है। जी में आता है कि नेम प्लेट के नीचे ये भी लिखवा दूं- हर प्रकार के सालों के थोक और फुटकर विक्रेता। 

हमारी बेटी एक ही वाक्य में आपका बेहतरीन चित्रण करती है –  ‘‘पापा की बगल से कोई कुतिया भी गुजर जाए, तो मम्‍मी उसे एक लात जरूर मारती हैं ’’🤣। वो नासमझ है, लेकिन मैं जानता हूँ कि आप ऐसा क्यों करती हैं। आपको बेगम परवीन सुल्तान का गीत “हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते” इतना क्यों पसंद है। हे देवि, हमारी शादी के वक्त आपकी भी परीक्षा चल रही थी और मेरी भी, इसीलिए आपकी विदाई नहीं हुई थी और हमारा गौना हुआ था। कम्‍बख्‍त दोस्‍त मेरा कितना मज़ाक उड़ाते थे – बेचारा एमए तो पास हो गया, लेकिन शादी में सप्‍लीमेंट्री आ गयी। मगर आपने जल्‍द ही उसकी क्षतिपूर्ति कर दी थी – 2 साल के अंदर ही मैं प्रोमोट होकर चाचा से पापा बन गया था। इसी रफ्तार से सरकार भी प्रोमोशन देती तो मैं 10 साल में कैबिनेट सेक्रेटरी बन गया होता। आज मैं बाप से दादा और नाना तक बन गया हूँ और, ये सब आपकी मेहरबानी है। हे देवि, मैं आपका हूँ, मेरे पास जो कुछ है, सब आपका है। इसीलिए जब आप मेरा एटीएम कार्ड लेकर शॉपिंग करने जाती हैं और मेरे मोबाइल पर एसएमएस पर एसएमएस आते हैं कि इतने बजकर इतने मिनट पर इतने हजार का  धुआं निकला; तब भी मैं कुछ नहीं कहता, बस सहगल साहब का गीत गुनगुनाता हूँ – आंसू न बहा, फरियाद न कर, दिल जलता है तो जलने दे। 

आपके घर वालों से मुझे बस एक ही शिकायत है कि मुझे आपके बारे में गलत जानकारी दी गयी थी। उन्होंने यह तो बताया था कि आपने महर्षि पाणिनी कन्‍या गुरुकुल से पढ़ाई की है, मगर मुझे यह नहीं बताया गया था कि आपको वहां तीर-तलवार के अलावा राइफल शूटिंग और जूडो-कराटे भी सिखाया गया है। आपको याद है, गौने से पहले मेरे मित्र और आपके बड़े भाई साहब ने हम-दोनों को निकाह फिल्‍म दिखायी थी। जब दीपक पराशर ने सलमा आगा से तीन बार तलाक़ – तलाक़ – तलाक़ कहा तो तड़प तो मैं भी उठा था, लेकिन आपने कहा कि सलमा की जगह मैं होती तो दीपक के गाल पर तीन बार तड़ाक़ – तड़ाक़ – तड़ाक़ जड़ती, फिर अपनी ‘भाई एकादश’ टीम को बुला लेती; बाकी का काम मेरे भाई कर देते। उस दिन से मैं आपसे इतना डरता हूँ कि आप लौकी की सब्‍जी भी पकाती हैं, तो मैं उसे मुर्ग-मुसल्‍लम समझकर खा लेता हूँ😭। मुझे वैदिक रीति से हवन करना आप ही ने सिखाया है। जानती हैं कि हवन के बाद मैं ‘सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया’ इतना जोर-जोर से क्यों बोलता हूँ? वो पड़ोसियों को सुनाने के लिए नहीं, आपके भाइयों तक अपनी दुआ पहुंचाने के लिए करता हूँ। यह श्‍यालक शब्‍द यूपी-बिहार में पहले साला बना, फिर उसके कई डिक्लेंशन हुए, जैसे सार, सरऊ आदि और इसका बहुवचन ‘सरवे’ है। तो मैं सर्वे भवंतु सुखिन: नहीं, ‘सरवे’ भवंतु सुखिन: कहता हूँ .. कि हे प्रभु, मेरे सालों को सुखी रखो, उन्हें निरोग रखो... जिंदगी शम्‍अ की सूरत हो खुदाया उनकी...। जिसके इतने साले कमाने वाले हों, उस जीजा का पेट तो उनके जूठन से भी भर जाएगा, उसे कुछ करने की क्‍या जरूरत? 

बच्‍चे मुझसे मेरी आंखें टेस्‍ट कराने और चश्‍मा लगवाने की बात करते हैं। मैं कहता हूँ कि अब मुझे क्‍या देखना बाकी रह गया है? अगर आप मुझे अब भी वैसी ही दिखती हैं जैसी 1984 में दिखती थीं, तो इसमें बुराई क्‍या है? जब अर्जुन को दिव्‍य-दृष्टि मिली और उसने श्रीकृष्‍ण का विराट-स्‍वरूप देखा तो चीख पड़ा - किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव... अर्थात हे प्रभु, मैं आपका विराट रूप नहीं, वही पुराना रूप देखना चाहता हूँ, आप वही रूप फिर धारण करें। अगर मैं चश्‍मा लगवा लेता हूँ तो मुझे आपका वही विराट रूप दिखेगा जो आपने इन 39 सालों में धारण कर रखा है। मैं उसे क्यों देखूं? मुझे तो आपका वही किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त.. अर्थात पुराना रूप ही अच्‍छा लगता है। भला कौन यक़ीन करेगा कि आपकी यह फोटो हमारी शादी के 10 साल बाद 1994 की है जब आप दरियागंज से एनटीटी कर रही थीं और हमारा दूसरा बच्‍चा भी 5 साल का हो चुका था? 

हे देवि, पंडितजी ने हमसे 7 जन्‍म का कांट्रैक्‍ट साइन कराया है। इन सब के बावजूद मैं आपको अख्तियार देता हूँ कि उस 7 के दायीं ओर जितने भी शून्‍य लगाना चाहें लगा लीजिए, मुझे कोई उज्र न होगा। जहां तक उन तीन गलीज लफ्जों की बात है, तो लाहौल बिला... उन्हें जुबान पर लाना तो दूर, कहीं लिखा भी दिख जाए तो उसे पढ़ना भी मैं गुनाहे-अजीम समझता हूं।

-शशिकांत सिंह