शायद मैं एक बुरी औरत हूँ
क्योंकि
मैं किसी आदमी से उसकी आँखों में देखकर बात नहीं करती
मैं उससे हाथ मिलाकर या गले मिलकर नहीं मिलती
मुझे मर्दों के सामने डांस करना नहीं आता
मुझे पार्टियों में मर्दों के साथ पीना और गाना नहीं आता
इसलिए
शायद मैं एक बुरी औरत हूँ

वक़्त की आज़माइशों ने मुझे सिखाया है
सच बोलना और लिखना
मुझे शब्दों को चाशनी में डुबोकर कहना नहीं आता
मैंने चुप रहकर बहुत कुछ सहा है
ज़िंदगी के इस मोड़ पर
अब मुझे समझ आया है कि
लोग दबे हुए इंसान पर ज़्यादा ज़ुल्म करते हैं
मैंने कफ़न ओढ़कर सच बोलना सीख लिया है
इसलिए
शायद मैं एक बुरी औरत हूँ।

-रमिंदर रम्मी
 ब्रैम्पटन, कनाडा