सिग्नल हो गया हरा, पर गाड़ियाँ वहीं खड़ीं,
आगे बढ़ने की सबको हो रही जल्दी  बड़ी।
सड़क पर हॉर्न यूँ बज रहे,
जैसे रणभूमि पर शंखनाद हो रहे।
 
स्टियरिंग पर पकड़ अपनी बनाए,
लक्ष्य पर हर ड्राइवर अर्जुन दृष्टि जमाए। 
होड़ में है एक दूजे से आगे निकलने की,  
स्वयंवर में जैसे जुटे हों वीर प्रतिद्वंद्वी।

चेहरे पर गुरूर धारे, करके तिरछी निगाहें,
फौज लिए सेनापति बना रहा ज्यों अपनी राहें।
किसी को अपनी राह के बीच आते देख,
भस्म कर दे ऐसे क्रोध से भर जाते नेत्र।

धैर्य भी अब सबका तोड़ रहा दम,
सोचें सब, "अब तो निकल ही लेंगे हम।"
तीस मिनट बाद भी वही “अब” का सब्र,
सड़क पर जैसे रेंग रहे हों उरग।

बाइक वाला दाएं से बाएं घुमा रहा, 
जैसे सड़क पर करतब दिखा रहा।
कार में बच्चे पूछें— “पापा, पहुँचेंगे कब?”
पापा बोले— “बस पहुँच ही गए… अब!”
मम्मी बोलीं इससे तो घर ही थी भली,
घर में पड़े हैं काम, सड़क पर हूँ खड़ी।

धैर्य खड़ा पसीना पोंछ रहा,
सोचता— “मैं क्यों हर बार ही यूँ टूट रहा?”
लोगों में बढ़ रही अकुलाहट,
सड़क पर अक्सर छिड़ जाती महाभारत।
 
जाम सड़कों पर मिलता है इतना यहाँ, 
धैर्य फुटपाथ पर रेंगता है धीमा यहाँ।
कलयुग का है यह यातायात पुराण,
सब्र का हर पल जहाँ होता इम्तहान।

-प्रीति ढींगरा