अपने मोहल्ले के प्रख्यात पर्यावरण प्रेमी शांति दास कल ही कह रहे थे कि हमारे मोहल्ले में इन दोनों ध्वनि प्रदूषण सिर्फ समस्या नहीं एक पूर्णकालिक सांस्कृतिक कार्यक्रम बन चुका है। यही कारण है कि देश में ध्वनि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। सुबह का सूरज अभी क्षितिज पर पूरी तरह टंगा भी नहीं होता कि टीवी का एंकर राष्ट्र को झकझोर देता है— “देश संकट में है!”
कौन-सा संकट— यह जानने के लिए दर्शक को पहले तीन विज्ञापन, दो ‘एक्सक्लूसिव’ और एक ‘महाबहस’ की वैतरणी पार करनी पड़ती है।

समाचार चैनल अब सूचना के विनम्र दूत नहीं रहे; वे उत्तेजना के उच्च-डेसिबल थोक बाजार में रूपांतरित हो चुके हैं, जहाँ खबरें तौली नहीं जातीं— गरज कर बेची जाती हैं। हां, खबर किलो में नहीं, डेसिबल में बिकती है। आज का एंकर पत्रकार कम, माइकधारी स्वतंत्रता सेनानी अधिक है। अंग्रेजी सरकार को भगाने के लिए भगत सिंह ने बम फेंका था, टीवी का एंकर काले अंग्रेजों की सरकार गिराने के लिए ब्रेकिंग न्यूज़ फेंकता है। चेहरे पर तात्कालिक क्रोध, आवाज़ में स्थायी कंपन और हाथों की गति ऐसी कि लगे अभी-अभी राष्ट्र का रिमोट इन्हीं को सौंपा गया हो। वह प्रश्न नहीं पूछता। प्रश्न को ऐसे फेंकता है जैसे योगी जी की पुलिस चेतावनी फेंकती है - “बताइए! हाँ या ना में जवाब दीजिए!!” एंकर उत्तर को ही गिरफ्तार करना चाहता है। बेचारा पैनलिस्ट “हाँ” बोलने की तैयारी करता है, तभी एंकर राष्ट्रहित में उसे म्यूट कर देता है- बोलती बंद।

एंकर की सबसे बड़ी योग्यता है— किसी को पूरा बोलने न देना। अगर गलती से कोई तथ्य निकल भी आए, तो उसे तुरंत शोर की रजाई ओढ़ा दी जाती है। अब देश कुछ मिनट के लिए टूथपेस्ट, तेल और बीमा कंपनियों के भरोसे है।

सुबह-सुबह चैनल अचानक अत्यंत आध्यात्मिक हो जाते हैं। वही स्टूडियो, वही कैमरा— बस आवाज़ का वॉल्यूम थोड़ा मधुर कर दिया जाता है। घोषणा होती है— “सिर्फ यह एक मंत्र सुन लीजिए… जीवन बदल जाएगा।” यह नए भारत का कौशल विकास है। टीवी पर भक्ति इतनी हाई डेफिनिशन में आती है कि लगता है— मोक्ष भी अब सेट-टॉप बॉक्स से मिलेगा। धार्मिक कार्यक्रमों की कहानी भी बहुत दिलचस्प है— पहले डर दिखाओ, फिर उपाय बताओ और अंत में प्रायोजक का धन्यवाद करो। भक्ति और ब्रांडिंग का ऐसा पवित्र गठबंधन शायद इतिहास में पहली बार हुआ है।

विज्ञापन इतने आत्मविश्वास से आते हैं कि लगता है— अगर यह साबुन न लगाया तो लोकतंत्र फिसल जाएगा अगर यह तेल न लगाया तो अर्थव्यवस्था जाम हो जाएगी और अगर यह ऐप न डाउनलोड किया तो देश डिजिटल रूप से नाराज़ हो जाएगा। समाचार बीच-बीच में आते हैं जैसे उपचुनाव आते रहते हैं और विज्ञापन ही असली स्थायी सरकार हैं।

कुछ ऐसा ही चल रहा था कि उसी समय मेरे मोहल्ले के प्रख्यात पर्यावरण-प्रेमी शांति दास दरवाज़े पर प्रकट हुए— चेहरे पर चिंता, कानों में रुई और हाथ में कपड़े का थैला।

वे फुसफुसाए— “देश में ध्वनि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है… और इसका ताज़ा स्रोत आपके ड्राइंग रूम में सक्रिय है।” मैंने चुपचाप टीवी की ओर देखा और उन्हें भीतर बैठा लिया। विज्ञापन खत्म हुआ और फिर से एंकर की आवाज गूंजी, “बताइए! हाँ या ना में जवाब दीजिए!”

मेरी बगल में बैठे शांति दास गंभीरता से कुछ लिख रहे थे।

झाँककर देखा— वे एंकर की आवाज़ का डेसिबल अनुमान कर रहे थे।

धीरे से बोले— “यदि यह पाँच मिनट और चला, तो इसे औद्योगिक शोर की श्रेणी में अधिसूचित करना पड़ेगा।” कहने लगे, रात नौ बजे देश में दो घटनाएँ लगभग निश्चित मानी जाती हैं— कहीं न कहीं बिजली का जाना, और टीवी चैनलों पर बहस का आना। यह बहस कम और ध्वनि-प्रदूषण का सांस्कृतिक उत्सव अधिक होती है। पैनलिस्ट ऐसे गरजते हैं मानो उनकी विचारधारा गिरवी रख ली गई हो, या बचपन का विवाद आज ही निपटाना शेष हो। एंकर बीच-बीच में संयम का आह्वान करता है— “एक-एक करके बोलिए!” एंकर चीखता हुआ शांति स्थापित करता है और स्वयं पाँच मिनट तक निर्बाध बोलता है।

शांति दास ने लंबी साँस लेकर कहा— “पहले लोग पेड़ काटते थे, अब ये लोग सन्नाटा काट रहे हैं।”

इतने में स्क्रीन पर लाल पट्टी दनदनाई— “सबसे बड़ी खबर!”

हम दोनों चौकन्ने हो बैठे। समाचार निकला— किसी नेता ने बयान दिया है।

शांति दास ने शांत भाव से टिप्पणी की— “घटना सूक्ष्म है, ध्वनि स्थूल। यह वैसा ही है जैसे मच्छर पर तोप दाग दी जाए।”

बहस अपने चरम पर थी कि एंकर गंभीर स्वर में बोला— “एक छोटे से ब्रेक के बाद…”

शांति दास ने राहत की साँस ली – विज्ञापन और मीडिया ही राष्ट्रनिर्माण के चौथे स्तंभ होते हैं और देश विनम्रतापूर्वक टूथपेस्ट, तेल और बीमा कंपनियों को सौंप दिया गया। “चलो, प्रकृति को कुछ क्षण का अवकाश मिला।”

पर अगला विज्ञापन दुगुनी ध्वनि में आया। उन्होंने तुरंत कानों की रुई ठीक की— “अब तो विज्ञापन भी पर्यावरण के सक्रिय प्रतिद्वंद्वी हो चुके हैं।” याद है आपको, चुनावी मौसम आया तो चैनलों पर सर्वे ऐसे उमड़े थे जैसे मानसून से पहले मच्छर और सूर्यग्रहण से पहले ज्योतिषी। स्क्रीन पर ग्राफ बंदरों की तरह उछल-कूद कर रहे थे।

मुझे याद आ गया। मैंने पूछा था —“क्या लगता है, दास जी?”

वे बोले— “यह सर्वे नहीं, लोकतंत्र की कुंडली है। फर्क सिर्फ इतना है— ग्रह बाद में बदलते हैं, आंकड़े पहले।”

लो जी, ज्योतिषी को याद करो और ज्योतिषी हाजिर। “आज सिंह राशि वालों के लिए विशेष योग है… ”शांति दास ने चश्मा उतारते हुए पूछा— “इन ग्रहों का जनसंपर्क विभाग कौन संभालता है? हर चैनल पर इनकी अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों होती है?” फिर गंभीर होकर बोले- “यदि शनि इतना ही सक्रिय है, तो इसे भी पैनल में बैठा लीजिए— कम से कम अपना पक्ष तो रखे।”

थोड़ी ही देर में समाचार चैनल आध्यात्मिक हो उठा। मंद संगीत, कोमल स्वर और घोषणा— “सिर्फ यह मंत्र सुन लीजिए… जीवन बदल जाएगा।” शांति दास हल्के से मुस्कराए— “कल रात यही चैनल राष्ट्र बचा रहा था, आज आत्मा बचा रहा है। बहुमुखी प्रतिभा का युग है।”

शांति दास शांति बिखेरकर चले गए। अब मेरे सिवा वहां सिर्फ शोर था। मैं शोर के आनंद में सराबोर था।

दास जी अपने घर गए। इंसान इसलिए तो घर बसता है और घर पर शासन करने के लिए घरवाली ले आता है। शांति दास की घरवाली शांति देवी - मोहल्ले की विख्यात वृक्ष-रक्षिका, हाथ में पौधों की सूची और मुखमंडल पर हरित दृढ़ता धारण करने वाली साक्षात वनदेवी का आधुनिक संस्करण। टीवी पर बहस देख रही हैं। शांति दास ने घर में प्रवेश किया। उन्होंने टीवी को ऐसे देखा मानो वही ध्वनि-प्रदूषण का मुख्य अभियुक्त हो। रिमोट भले ही टीवी का था पर नियंत्रण पूर्णतः शांति देवी के पास था। शांति दास तुरंत करुण हो उठे— “मैं उदास हूँ… तुम्हारा शांति दास। यह ध्वनि प्रदूषण बंद करो, डार्लिंग।”

इसके बाद जो हुआ, वह घरेलू लोकतंत्र का प्राइम-टाइम संस्करण था।

टीवी म्यूट हुआ। शांति देवी अनम्यूट हुईं। कमरे में एकमात्र स्थायी ध्वनि— घरेलू पर्यावरण सम्मेलन चालू हो गया।

अंततः शांति देवी ने निर्णायक वाक्य छोड़ा— “पेड़ बचेंगे तो देश बचेगा!” शांति दास ने दार्शनिक थकान में उत्तर दिया— “और यदि सुनने की शक्ति ही नहीं बची… तो पेड़ अपनी हरियाली किसे सुनाएँगे?” क्षण भर का मौन उतरा— दुर्लभ, विलुप्तप्राय मौन। टीवी बंद हुआ। कमरे में शांति लौटी। शांति दास ने संतोष से कहा— “प्रकृति अभी जीवित है… बस टाइम-टाइम के कार्यक्रम में दब जाती है।”

उन्होंने खिड़की खोली। बाहर जीवन सामान्य था। बोलते गए - खबर अब धीरे से नहीं आती, वह चीखकर टीआरपी माँगती है। टीवी बंद करके जब आदमी खिड़की खोलता है तो हैरान हो जाता है — देश अभी भी चल रहा है, लोग अब भी अपने काम पर जा रहे हैं, और लोकतंत्र अभी तक म्यूट नहीं हुआ है। सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज यही है— सच आज भी मौजूद है… बस वह टीवी-टाइम में नहीं आता।

-मुक्ति नाथ मिश्र