राष्ट्रवादी जी से अभी कुछ दिन पहले मुलाकात हुयी तो वे बड़े जोश में भरे थे और चिल्ला चिल्ला कर बता रहे थे – “मोई है तो मुमकिन है।”

जब से मोई जी आये हैं तब से महंगाई कंट्रोल में आ गयी। पेट्रोल–डीजल के दाम घट गये। जल्दी से सब लोगो को ‘बैंकअकाउंट’ भी खुलवा लेने चाहिए क्योंकि ‘काले धन’ पर भी एसआईटी बैठ गयी है और एसआईटी के उठते ही ये मुआ कालाधन छलांग मार के सीधा पब्लिक के अकाउंट में जायेगा। विकास के होने में भी टाइम जरूर लग रहा है पर होगा जरूर। देश में पहले मौनमोहन का राज था, अब देश को बोलते रहने वाला प्रधानमन्त्री मिला है,  जिसने पिछले प्रधानमन्त्री द्वारा उपयोग न किये गये बोलने के कोटे का उपयोग  किया है और अब वो तब  कुर्सी छोड़ेगा जब  अगले दस सालों के बोलने के कोटे का ओवर ड्राफ्ट ले चुका होगा।  “मोई जी के मन की बात” सुनने के बाद तो कुछ और सुनने का मन ही नहीं रहता।” 

राष्ट्रवादी जी को रोका टोका न जाए तो वे अनन्तकाल तक अनवरत “मोई पुराण” बांचते रह सकते हैं। पर आज वही राष्ट्रवादी जी कुछ खिन्न और उदास दिखे तो मुझे चिंता हुयी। 

राष्ट्रवादी जी इतने  उदास और मायूस पहली बार लग रहे थे। उनका यों उदास होना मेरे लिए थोड़ा अचरज भरा था। मुझे देखकर कन्नी काटकर वे  जाने लगे तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। आश्चर्य की वजह भी थी। 2014  के बाद से ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि राष्ट्रवादी जी ने मुझ  पर नज़र पड़ते ही “वन्देमातरम” और भारतमाता की जय का नारा न लगाया  हो। 

अब उनके इस उद्घोष में उनका राष्ट्रवाद ज्यादा था या मुझे वामी-कामी समझ कर चिढ़ाने  का भाव ज्यादा था, मैं आज तक तय नहीं कर पाया, पर मैं उन लोगो में से तो हूँ नहीं जो कैमरे पर आकर “मैं वन्देमातरम नहीं बोलूँगा” कहकर कुछ लोगों के हीरो बन जाया करते हैं। हम ठहरे कलम के मजदूर  जो, “जैसा देखता है वैसा लिखता है वाला”। 

 तो राष्ट्रवादी जी के वन्देमातरम का जवाब वन्देमातरम से देते मुझे कभी झिझक नहीं हुयी, परंतु मेरे मुँह से वन्देमातरम सुनकर राष्ट्रवादी जी के चेहरे पर संतोष और व्यंग्य का जो भाव उपजता था उसे देखकर मेरी मुद्रा कुछ देर के लिए शोचनीय हो जाती थी। 

खैर आज शोचनीय मुद्रा राष्ट्रवादी जी की थी। उससे भी शोचनीय बात यह थी कि आज पहली बार मुझे देखकर उन्हीने चुपके से खिसकने की कोशिश की थी पर आखिर हमने भी घाट घाट का पानी पी रखा है तो हमने राष्ट्रवादी जी को घेर ही लिया। 

“कैसे हैं राष्ट्रवादी जी? क्या चल रहा है देश में? कुछ विचलित दिख रहे हैं?  कोई पहलगाम या ऑप सिंदूर फिर हो गया क्या?”

“कुछ नहीं लेखक महोदय, ई साला मोई पागल हो गया।”

मुझे एक बारगी तो अपने कानों पे यकीन नहीं हुआ, मैंने फिर पूछा – “क्या कहा आपने? ”

“यही कि मोई पागल हो गया?  सा -- यू जी सी ले  आया।”

मुझे लगा सच में मामला कुछ सीरियस है, इसलिए कुर्सी पर बिठा कर पहले राष्ट्रवादी जी को पानी का गिलास पकडाया और उनके पानी पी लेने के बाद पूछा- “हा तो अब बताइए क्या मामला है?”

“अरे यू जी सी की गाइड लाइन के आड़ में हमें और हमारे बच्चो को जेल भेजने की तैयारी कर दी इसने, पहले एट्रोसिटी एक्ट में 21 की जगह 47 मामलों को शामिल कर दिया, हम ने ज़हर का घूंट कडवी दवाई समझ कर निगल लिया और अब ये।”

मैंने राष्ट्रवादी जी से सहानुभूति जताते हुए कहा, ”आप निश्चिन्त रहो, इसमें ज़रूर मोई जी कोई मास्टर स्ट्रोक होगा।”

अब तो हमे कहर बरपाती नज़रों से घूरते हुए राष्ट्रवादी जी कुर्सी से उठ खड़े हुए और बोले ये निपटा देगा पार्टी को। 

मैंने भी सहमति में सिर हिलाया –  “मोई है तो मुमकिन है।”

-अरविंद पथिक