राम स्वरूप को अपना बचपन रह रह कर याद आ रहा था। और याद आ रहे थे उसके पूज्य पिता शांति स्वरूप जी। शांति स्वरूप जी वैसे बहुत अमीर तो नहीं थे पर राम स्वरूप के लिए उन्होंने कभी कोई कमी नहीं रहने दी थी।
शांति स्वरूप जी शौकिया और रंगीन तबीयत के मालिक थे। अच्छे कपड़े पहनना, अच्छा भोजन करना और हर शाम तो एक ड्रिंक्स लेना भी उनकी दिनचर्या में शुमार था।
राम स्वरूप की पत्नी ने राम स्वरूप को लगभग हिलाते हुए कहा "अजी, जल्दी से नहा लो बस पंडित जी आते ही होंगे, मैंने तेरहवीं की सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं। पंडित जी ने जो जो भी सामान मांगे थे सभी इकट्ठे कर लिये हैं।"
पंडित जी तेरहवीं की पूजा करते जा रहे थे और यथाशक्ति सभी क्रियाओं का अर्थ भी साथ साथ समझाते जाते थे।
तेरहवीं की पूजा के लगभग अंतिम पड़ाव में पंडित जी ने राम स्वरूप को कहा कि अब पिता की आत्मा को महाप्रसाद देने का समय आ गया है। इसी के साथ पंडित जी ने महा प्रसाद का महात्म्य भी समझाया।
पंडित जी बोले, "देखो आज के बाद आपके स्वर्गवासी पूज्य पिता की आत्मा अपने निर्वाण की ओर प्रस्थान करेगी, अतः आप आज उनको उनके पसंद का महाप्रसाद अर्पण करें।"
राम स्वरूप की पत्नी ने पहले से ही अपने श्वसुर की पसंद की सारी चीजें आज बनाई थी।
राम स्वरूप के कहने पर राम स्वरूप की पत्नी शांति अपने पूज्य स्वर्गवासी ससुर जी के लिए महा प्रसाद का प्रबंध करने लगीं।
कुछ ही क्षणों में शांति एक थाल में लगभग बारह पूरी, पनीर की सब्जी, छोले, कद्दू की खट्टी मीठी सब्जी, खीर ले के आ गयी और अपने श्वसुर की तस्वीर के सामने सभी चीजें बहु ने श्रद्धा के साथ रख दी। भोजन लगभग दो या तीन व्यक्तियों के जरूरत के हिसाब से रहा होगा।
यह देख कर पंडित जी ने पूछा की, 'ये सब किस के लिए, मैं थोड़ा बाद में महाप्रसाद ग्रहण करूँगा'।
रामस्वरूप ने पंडित जी को जवाब दिया, 'पंडित जी जैसा की आपने बताया था, आज हमने अपने पिता जी की पसंद का ही भोजन तैयार किया है। वैसे तो मेरे पिताजी 3-4 रोटियां ही खाते थे परन्तु अगर उनकी पसंद की पूरी और सब्जियाँ बनीं होती थी तो कम से कम 10-12 पूरियाँ तो खाते ही थे, इसलिए ये पिता जी का पूरा एक समय का भोजन है क्योंकि अब वो दोबारा तो मांगेंगे नहीं।'
यह सुन कर पंडित जी राम स्वरूप की मासूमियत पर खिलखिला दिए और बोले, 'जजमान, आत्मायें स्थूल भोजन नहीं करतीं, वो तो बस उनकी गंध से ही तृप्त हो जाती है, इसलिए बस एक पूरी और एक एक चम्मच सब्जियां ही उनके लिए पर्याप्त है। हां उनकी पसंद की चीजों को एक बार और परोसा जा सकता है।'
इसके साथ ही पंडित जी ने कहा, 'जजमान आप तो बहुत ही भोले हो।'
पंडित जी ने एक पूरी और एक एक चम्मच भर सब्जी का महाप्रसाद रख कर बाकी का सारा भोजन वापस रसोई में रखने और उन्हें जीमते समय देने को कहा।
इसके साथ ही पंडित जी ने मंत्रोच्चार के साथ शांति स्वरूप जी की आत्मा का आह्वान किया और महा प्रसाद ग्रहण करने का आग्रह किया।
पंडित जी ने अचानक पूछा, 'जजमान आपके पूज्य पिता जी तो व्हिस्की के भी शौक़ीन थे।'
राम स्वरूप ने महसूस किया कि ऐसा पूछते वक्त पंडित जी की आँखों में अनोखी चमक सी आ गयी थी।
राम स्वरूप के हां कहने पर पंडित जी ने उन्हें पुछा, 'वो कौन सी ब्रांड की पीते थे?'
राम स्वरूप ने जवाब दिया, 'ब्लैक लेबल।'
पंडित जी बोले, 'तो जजमान, अपने पिता की आत्मा की आत्मिक शांति तो तभी होगी जब उनको उनकी प्रिय वस्तु मिलेगी।'
राम स्वरूप ने तुरंत पिता की अलमारी से ब्लैक लेबल की बोतल मँगवा ली.
राम स्वरूप ने बोतल का ढक्कन खोला, उसमें से आधा चम्मच पिता को अर्पण कर दी और बाकी बोतल को वापस रखने को कह दिया।
पंडित जी तुरंत बोले, 'पूरी बोतल ही रहने दीजिये उनकी आत्मिक शांति के लिए.'
राम स्वरूप की मासूमियत फिर से बोल उठी, 'पंडित जी बोतल खोलते ही मुझे और पूरे कमरे में ही उसकी गंध फ़ैल गयी थी तो पिता की आत्मा के पास तो जरूर पहुँच गयी होगी.'
ऐसा कह कर बोतल वापस रखवा दी।
इसके साथ पंडित जी ने अगले पांच मिनट में ही पूजा समाप्त करवा दी और बोले, 'उनको अचानक याद आ गया है कि उनको कही और भी पूजा करने जाना है।'
-डॉ. सुरेन्द्र सिंह रावत