[ अब की बार लोगों के दिमाग में फिर कवि सम्मेलन का खब्त सवार हुआ। बहुत आन्दोलन हुआ, अन्त में सर्वसम्मति से निश्चित किया गया कि इस वर्ष सम्मेलन, ज़मीन और आसमान के बीचोबीच करना चाहिए। बस, इस काम के लिये एक जय्यद जहाज (हवाई) मंगाया गया, जिसमें बैठ कर कवि-समाज आकाश की ओर उड़ा। वहाँ से बिना तार के तार द्वारा जो समाचार उपलब्ध हुए हैं, वे नीचे दिये जाते है-सम्पादक।]

अहा! वायुयान में बड़ा आनन्द आ रहा है। यहाँ आकर कवि लोगों के मस्तिष्क में एक अद्भुत स्फूर्ति पैदा हो गई है। लोगों के दहकते दिमाग से शायरी के शौले बड़ी तेजी से फूट रहे है। नाम कहाँ तक गिनाऊँ, सभी प्रसिद्ध-प्रसिद्ध कवि मौजूद है। आज रात को पौने दो बजे से कवि सम्मेलन की कार्यवाही प्रारम्भ हुई। समस्या थी--"आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना"। हिन्दी समस्या के स्थान पर उर्दू 'तरह' को सुन कर कवि-समाज बेतरह नाराज हुआ! घनघोर वाग्युद्ध होने लगा, खूब लनतरानियाँ हंकी! घूंसे मुक्कों तक की नौबत आ गई! लोग वायुयान से असहयोग तक करने को तैयार हो गये! पर, सम्मेलन के प्रधान श्रीयुत काव्य-कण्टकजी ने अपनी अपूर्व योग्यता द्वारा सब का समाधान कर दिया और उक्त उर्दू समस्या पर ही पूर्तियाँ पढ़ने की आज्ञा दी। प्रधान की 'रूलिंग' सबको माननी पड़ी और कवियों ने एक-एक करके पूर्तियाँ सुनानी शुरू कीं, कुछ पूर्तियाँ इस प्रकार थीं--

समस्या--
"आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।"

पूर्तियाँ--
संवाददाता कवि--
शहरो में घूम-फिर कर खबरों को खोज लाना, 
आता है याद हमको गुजरा हुआ ज़माना।

पाचक कवि--
पकवान खीर पूरी सखरी खरी पकाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

भक्त कवि--
चौकी पे पाठ करना और बार-बार न्हाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआा ज़माना।

पतित कवि--
वचनों को भंग करना लुटिया सदा डुबाना, 
आता है बाद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

लेखक कवि--
ले लेख दूसरो के निज नाम से छपाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

भुक्खड़ कवि--
बेकूत पेट भरना इस बार दस्त जाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

'डायर' कवि-
निर्दोष भाइयों पर गन-गोलियां चलाना, 
आता है याव हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

निकम्मा कवि--
करना न काम कुछ भी पर चैन की उड़ाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

स्वार्थी कवि--
लोगों से ठग के खाना गुर्राना-गुरगुराना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

कौंसिल कवि--
बनकर प्रजा का प्रतिनिधि कुछभी न कर दिखाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

म्युनिसिपल कवि--
करके असावधानी सब शहर को सड़ाना, 
आता है याद हमको गुजरा हुआ जमाना।

करुण कवि--
निज देश-दुर्दशा पर आँसू सदा बहाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

गायक कवि--
स्वरहीन गीत गाना; बेताल 'गत' बजाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

जमीदार कवि--
आसामियों को दुख दे 'कर-भेज' का बढ़ाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

वकील कवि--
अभियोग लड़-लड़ा कर शुकराना खूब पाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

वैद्य कवि--
अल्पज्ञता के कारण रोगी का दम घुटाना, 
आता है याद हमको गुज़रा हुआ ज़माना।

कवियो की समस्या-पूर्तियों पर एकदम 'वाह-वाह' और 'मरहबा-मरहबा' की आवाजें आने लगी। कितने ही मनचले तो मारे प्रसन्नता के पेट पीटने लगे। बड़ा कोलाहल हुआ। जहाज का कप्तान समझा कि कोई आफत आई! दंगा हो गया! चट उसने 'वायुयान' की गति जमीन की ओर की। थोड़ी देर में ही वह नीचे आ गया। प्रेसीडेण्ट ने कहा--"लो, अब आप लोग उतरें और अपनी-अपनी इच्छाएं पूर्ण करे। आप लोगो ने कविता तो कुछ की नही, अपनी-अपनी ख़्वाहिशों का इजहार जरूर किया। अच्छा, अब आप आजाद हैं, जिसका जी जिधर चाहे उधर वह जा सकता है। सम्मेलन खत्म किया जाता है।"

-पं० हरिशंकर शर्मा
(1931)