मैं अच्छी गहरी नींद में सोया पड़ा था। इसी बीच मुहल्ले की पहरेदारी करने वाले चौकीदार ने तेज आवाज लगाई—"जागते रहो!" और मैं जाग गया। कुछ देर तक मुझे नींद उचटने का कारण समझ में नहीं आया। चौकीदार ने जब सीटी बजाकर दोबारा "जागते रहो" का तेज नारा बुलंद किया तो स्थिति स्पष्ट हुई।

पुनः सोने की कोशिश करने पर भी जब नींद नहीं आई तो विचारों की घुड़दौड़ प्रारम्भ हो गई। मैं सोचने लगा कि इस चौकीदार को मुहल्ले वालों ने रात्रि पहरेदारी के लिए लगा रखा है, ताकि हम सब अपने घर-सामान की चिंता से मुक्त होकर निश्चिंततापूर्वक सो सकें। लेकिन यह बड़ा विचित्र चौकीदार है, जो हमें ही आवाज लगाता है—"जागते रहो!" अरे भाई, यदि हमें ही जागना है तो पहरेदारी के लिए उसे लगाने की क्या आवश्यकता थी?

जब नींद ने असंतुष्टों की तरह समझौता करने से इंकार कर बगावत का तेवर दिखलाया, तो हमने भी 'हाई कमान' की तरह उसे सख्तीपूर्वक खदेड़ बाहर करने का दृढ़ निश्चय किया, और बिस्तर से उठकर सड़क पर आ गए। बाहर आकर हमने चौकीदार को पास बुलाया।

पास आते ही उसने कहा—"शलाम शाब! क्या बात है?"

"क्यों भाई, 'जागते रहो' की आवाज लगाकर क्यों लोगों की नींद हराम करने में लगे हो?" मैंने पूछा।

चौकीदार ने जवाब दिया—"आपको आवाज नहीं लगाएगा शाब, तो तुम समझेगा चौकीदार शाला सो गया। हम जाग रहा है, येई बताने को आप लोगों कू आवाज लगाता शाब।"

मैंने कहा—"जब तुम चिल्ला-चिल्ला कर रात भर हमें जगाए रखोगे, तो फिर तुम्हें रखने का क्या मतलब? फिर चौकीदारी हम ही नहीं कर लेगा?"

चौकीदार ने तत्काल कहा—"हम नहीं रहेगा तो तुमकू जगाएगा कौन शाब? तुम शो जाएगा के नई, फिर इधर तुम शोया के उधर चोरी हुआ।"

बड़ा विचित्र मामला फंस गया था। चौकीदार की बात में मैं ही उलझ कर रह गया। मोहल्ले वालों ने चोरों से बचने के लिए चौकीदार रखा है, और चौकीदार है कि चोरों से बचने के लिए हमें ही जागते रहने का उपदेश दे रहा है।

यह सोचते-सोचते देश का ख्याल आ गया। देश की सरकार ने भी आम जनता को जागते रहने तथा सावधान रहने का संदेश दिया है। हमारे बीच छुपे दुश्मनों से खतरे की आशंका प्रकट की है। हमने लापरवाही बरती, तो वह दुश्मन फायदा उठा लेगा।

ईमानदार चौकीदार की तरह सरकार हमें चिंतित कर खुद निश्चिंत हो गई है—अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने। सरकार का क्या!" सरकार का काम है आने वाले खतरे से आगाह कर देना। उससे निपटना, उससे सावधान रहना हम सबका काम है। इसीलिए तो हमने सरकार का चुनाव किया है। सरकार की जब भी नींद खुलती है, तो इस अलाल कामचोर राष्ट्र के नाम एक संदेश पेल कर हमें चिंतित कर देती है और स्वयं फिर लंबी तान कर सो जाती है। और भैया, हमारा तो काम ही है दुश्मनों से लड़ना और पिटते रहना। लेकिन हम सरकार की नींद में खलल नहीं डालेंगे। सच्चे राष्ट्रभक्त की यही तो पहचान है। जो ऐसा नहीं करते, हल्ला मचाते हैं, सरकार को चैन की नींद सोने नहीं देते, वे देशद्रोही हैं, राष्ट्र के नाम पर कलंक हैं।

ऐसे लोगों को हम भी समझाते हैं—भैया, जब सरकार को चुना है तो उस पर भरोसा करो, उसकी बात पर भरोसा करो। जब सरकार कह रही है कि भ्रष्टाचार नहीं चलने दिया जाएगा, तो चुपचाप मान लो कि नहीं चलेगा। काहे पनडुब्बी, बोफोर्स, स्विट्जरलैंड की रट लगाए रखे हो।

अरे इतने बड़े लोग हैं, क्या जरा सी बात के लिए झूठ बोलेंगे? इतने सारे काम हैं, क्या सरकार हर चीज का ध्यान रखती रहेगी? गलती से कोई बात हो गई तो अब जांच हो जाएगी। यदि जांच में भी कोई गलत बात सामने आ गई, तो कानून बनाकर उसे रेगुलर कर लेंगे। जरा सबर करना सीखो भैया, इसके लिए इतनी हाय-तौबा मचाने की क्या जरूरत है? यह तो नहीं हुआ कि संकट की घड़ी में सहयोग करो, उलटा बदला भुनाने को देखने लगे। बुजुर्गों ने सही कहा है भैया, सही दोस्त और दुश्मन की परख संकट के समय ही होती है। इतने सारे विदेशी दौरों, दंगों, आदिवासी दर्शन तथा स्वागत समारोहों से थकी सरकार को थोड़ा आराम भी नहीं करने दिया और नींद हराम करके रख दी विघ्नसंतोषियों ने।

देखा कैसा जगाया चौकीदार ने? उसने हमें जगाया चोरों से बचे रहने के लिए और दिमागी घोड़े पता नहीं कहाँ-कहाँ पहुँच गए।

मैंने चौकीदार से पूछा—"तुम हमें जगाए रखते हो, फिर भी चोरी क्यों हो जाती है?"

भेदभरी मुस्कान के साथ चौकीदार ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—"वाई तो हम भी बोलता शाब! तुम ठीक से जगता नहीं, शावधान नहीं रहता, तो चोर चोरी करेगा ही। हमारा काम तो शाब तुमकू जगाना है, बाकी सब काम तूमरा है।"

यह कहते हुए चौकीदार 'जागते रहो' का तेज नारा देते हुए आगे बढ़ गया।

मैं सोच रहा था—शायद सरकार भी तो ऐसा ही कुछ कह कर बरी हो जाती है।

ईश्वर शर्मा
[भिखमंगों की पेंशन कथा, 1959]