इस शहर की सभ्यता हद है
हर चने का झाड़ बरगद है

कुर्सियां चुंबक नहीं लोगो 
बैठने वाला ही अंगद है

इस कदर है शोर सड़‌कों पर
जैसे चौराहों पे संसद है

फाइलों की देखकर सेहत
देश का इतिहास गदगद है

उसकी जेबों में सिफारिश थी
इसकी आंखों में खुशामद है

आओ, मरघट में जियें कुछ दिन 
ये जगह बिल्कुल निरापद है

-प्रदीप चौबे