बुरा जो देखण मैं चला, बुरा न मिलिया कोइ।
जो दिल खोज्या आपणा, मुझसा बुरा न कोइ॥
(आत्म-व्यंग्य)

पाहण पूजै हरि मिलै, तो मैं पूजौं पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥
(बाह्य आडंबर पर व्यंग्य)

काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
ऐकै आषिर पीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥
(मिथ्या ज्ञान पर व्यंग्य--किताबी ज्ञान (पांडित्य) के विरुद्ध यह कबीर की सबसे प्रसिद्ध साखी है)

जौ तूँ बाभन बाभनी जाया, तौ आन बाट काहे नहीं आया?
जौ तूँ तुरक तुरकनी जाया, तौ भीतर खतना क्यों न कराया?
(जातिगत अहंकार पर व्यंग्य करता कबीर का निर्भीक पद। यहाँ कबीर जन्म आधारित श्रेष्ठता को चुनौती दे रहे हैं।) 

संदर्भ:

  1. कबीर ग्रंथावली — संपादक: बाबू श्यामसुंदर दास (नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी)।

  2. कबीर — डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (राजकमल प्रकाशन)।

  3. बीजक — संपादक: शुकदेव सिंह।

[संकलन : भारत-दर्शन]