दोस्तो यह गठबंधन भी कमाल की चीज है, जम जाए तो जम जाएं, अन्यथा गठबंधन की डोर खुलने में देर कहां लगती है! ऐसा ही कुछ पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में हुआ। कहते हैं दिल्ली दिल वालों की है, इतिहास देखें तो पता चलेगा कि कितनी बार दिल्ली पर क्रूर शासकों ने राज किया और प्रजा को बदहाली में जीना पड़ा!

यही सामना अपने विलायती राम पांडेय को झेलना पड़ा। हुआ क्या कि बिजली विभाग में आमूल चूल परिवर्तन लाने के लिए एक बैठक का आयोजन उनके विभाग ने किया था, बड़े साहब ने पांडेय जी को इंचार्ज बनाया था, पांडेय जी ने कुछ और एक्सपर्ट का नाम भी मीटिंग में रखवा दिया और अपने साथ विभाग के पक्के और अनुबंध के कर्मचारियों को भी जोड़ लिया। 
पांडेय जी अपने तय समय से दफ्तर के लिए रवाना हुए; रात रह रह का बादल गरजे और आखिरकार बरस ही गए। पांडेय जी सड़क पर और धीरे धीरे मूसलाधार बारिश स्वागत करती चली गई, उसका परिणाम यह हुआ कि जाम पे जाम। पांडेय जी देखते रहे और सोचते रहे कि क्या पता आगे मामला सेटल हो जाए। 

लेकिन साहब जब मामला हद से निकल जाता है तो स्थितियां बेहद विकट हो जाती है, आखिरकार वही हुआ। 

घड़ी ने दस बजाएं और पांडेय जी का ब्लड प्रेशर ऊपर नीचे कबड्डी खेलने लगा। आखिरकार पांडेय जी ने दयाल बाबू को फोन लगाया, कि भइया संभाल लेना। उल्टे दयाल बाबू ने कहा आज तो भगवन मेट्रो से आना था, बात भी सही थी, लेकिन पांडेय जी ने क्या सोचा था! कि हालत इतनी बिगड़ जाएगी!

सड़कें जाम, हवाई अड्डे की छत टूटी, पार्किंग में गाड़ियां डूबी। और अपने पांडेय जी बड़ी मुश्किल से बचते बचाते पौने बारह के करीब दफ्तर लगे। उधर बैठक शुरू हो चुकी थी, बड़े साहब ने मामला संभाल लिया, पांडेय जी ने सभी से क्षमा याचना करते हुए बैठक में प्रवेश किया। 

बहरहाल जो लिखा होता है वही हुआ। 

अगले दिन पांडेय जी अपने छज्जे पर, अखबार हाथ में था, उसमें लिखा था कि 88 वर्षों में इतनी बारिश हुई जिसने महीने भर की कसर निकाल ली, पांडेय जी डूबे हुए शहरों की खबरें पढ़ते हुए नजर आए। हाथ में चाय का प्याला और मोबाइल पर हनुमान चालीसा का पाठ उन्हें अत्यधिक बौद्धिक बना रहा था। पढ़ते हुए वे रचनात्मक हो गए; आइए देखते है कि उन्होंने क्या लिखा:

जाम

क्या होता है
जाम में फंसना 
आज जाना
मतलब आप कित्ती ही बड़ी तोप हो
बेकार है
न तो 
आप अपनी गाड़ी निकाल सकते
न उछाल सकते
बस खड़े रहो
और कोसते रहो
एक बात बताइए
कोसने से क्या होगा!
क्या जाम खुल जाएगा
काहे अनावश्यक पौधों को गीला करते हो बे!
यह उनके लिए कहा जो बेचारे फंसे हुए है ट्रैफिक में
और ट्रैफिक हवलदार लापता है
हमेशा से
और ट्रैफिक में फंसी गाड़ियां घूम रही है
इधर से उधर
और दिमाग लगा हुआ है माथापच्ची में
यह आज की बात नहीं बरसों बरसों पुरानी है
सुबह जाम और शाम का जाम अलग
दोनों जगह विरोधाभास अलग है
कहीं जाम छलकता है तो कहीं गाड़ियों की भिड़ंत
अजब खेल है
और अजब हाल है
क्या होगा दुनिया का

इति कथा
कथा अनतः। 

तभी रामप्यारी ने कहा क्या नाश्ता कर लिया! पांडेय जी ने कहा अभी कहां! सोचा आप की अनुकम्पा होंगी तो मिल ही जाएगा। तभी बगल में कुछ महिलाएं आम के पेड़ पर निशाना लगाए थी, उनके आदमियों के हाथों में लंबे डंडे थे जिसकी सहायता से वे आम तोड़ रहे थे, पांडेय जी को यह भी सुनाई दे रहा था कि इससे चटनी बनेगी, किसी ने कहा काट कर मिर्च लगा कर खाया जाएं तो भी स्वादिष्ट लगता है। इधर पांडेय जी सोचने लगे कि देश कहां जा रहा है! और ये लोग अभी भी स्थानीय आनंद में डूबे है और वैसे भी डूबना किसे पसंद नहीं। 

अब आते है कलसी पर जिनका असली नाम गैंदा मल कलसी है, उन्होंने एक पत्रिका के संपादक को फोन लगाया और जो कहा वह शब्दश: यहां प्रस्तुत है...

कलसी: नमस्कार, कैसे है! अच्छा मेरा पैसा जो मैंने दिया था, वह लौटा दें। 

पत्रिका संपादक : सुनिए, आज से पहले जो दो अंक निकाले, उन पर तो कोई सहयोग नहीं किया, बल्कि सपने जरूर दिखाएं। 
कलसी: मैं कुछ नहीं जानता, पैसे मेरे लौटा दें अन्यथा अच्छा नहीं होगा। 

पत्रिका संपादक चुप। और गहरी सांस लेते हुए माथे के बल चिंतन की स्थिति में। 

पत्रिका संपादक रगड़ानंद ने दिल्ली के विलायती राम पांडेय को फोन लगाया। 

अंदर की बात, जब किसी की सुलगती है और कोई उपाय नहीं सूझता तो वह केंद्र में बैठे व्यक्ति से ही मदद की अपेक्षा रखता है। 

रगड़ानंद ने पांडेय जी को कहा: देखिए, सारा मामला समझा दिया। अब आप मार्ग सुझाएं?

पांडेय: उनको कहिए, जब होगा, तब विचार होगा, अभी हाथ खाली, जेब खाली है। 

रगड़ानंद: जी, समझा गया। 

पांडेय ने कहा इसका अर्थ यह भी होता है कि मैं धनराशि किसी भी हालत में नहीं लौटाऊंगा, समझे!

पांडेय ने मंथन किया कि कैसे गजब लोग है! जो अपना पैसा खर्च कर अपनी हवा बनाते है, जबकि अंदर की बात यह उन्हें कोई नहीं पूछता। मार्किट में उनका शेयर लिस्टिंग होने में भी शर्माता है, बड़ी विचित्र स्थिति है। 

ऐसे ही लोगों का गठबंधन हुआ अब जिसमें गैंदा मल कलसी और चुप्पी प्रसाद भट्ट एक सरीखे है, एक प्रकाशक जिसने रॉयल्टी किसी को भी नहीं देने की कसम खाई हो और दूसरा एक जुगाड़ परंपरा का थका लेखक। जिसे चाहिए अब आराम करें, नहीं जी उसे तो आगे बढ़ कर किसी और का हक मारना है, जिसे लेने में न केवल वह प्रवीण है बल्कि थूक कर चाटना हो तो उसमें भी अव्वल है। बहरहाल समाज ऐसे लोगों से भरा पड़ा है। 

आइए थोड़ा आगे बढ़ते है और इस तरह की बदहाल जिंदगी में उपजे चरित्रों से हमेशा आगे ही बढ़ते हुए सोचना होगा, अन्यथा समय का भी नुकसान होगा और व्यक्तिगत चिंताओं का भी। अंतर्मन ने कहा आप जो सोचते है वह हमेशा अच्छे के लिए सोचते है। 

मौसम के बदलने की माफिक कलसी और चुप्पी प्रसाद भट्ट का खेल जारी है, लेकिन एक सर्वे की रिपोर्ट का यह कहना है कि यह संबंध स्थायी नहीं है, दोनों अपना उल्लू साधने के लिए साथ है जब खेल बिगड़ा तो नेचुरल है कि दोनों राहें अलग हो जाएगी, यह बात अपने विलायती राम पांडेय बखूबी जानते है और बाय द वे उन्होंने धूप में बाल कोई यू ही सफेद नहीं किए, क्या समझें!

मार्किट में हवा है कि दोनों का गठबंधन टिकाऊ नहीं, जबकि पांडेय जी का यह कहना है कि दोनों बिकाऊ ही नहीं, कौन खरीदेगा!

लेकिन वही बात है साहब कि तू डाल डाल मैं पात पात। खैर जाने दीजिए, दुनिया के दस्तूर है यहां। मान लीजिए आप किसी रेलगाड़ी में बैठे हैं तो कितने ही स्टेशन आते हैं और सवारियां चढ़ती उतरती है किसी से भी किसी का परमानेंट रिलेशन नहीं होता, सब टेंपरेरी है, रिश्ते भी नाते भी। बात साफ है जो दिखता है वह होता नहीं और होता है वह दिखता नहीं। दुनिया की रीत को पांडेय जी अपने अनुभव से समझ भी चुके और सीख भी चुके हैं, उनका मानना है कि अब कोई चाह नहीं बची, बस मुट्ठी भर मित्र साथ हो और वे केवल जेनुअन किसिम के हो, बस। 

बाकी तो चुप्पी प्रसाद भट्ट और कलसी प्रकरण के किस्से दो कौड़ी के भाव के है, क्या ही बात करें! आखिर जीवन आगे बढ़ने का नाम है और यह एक पाठशाला है जहां आदमी सीखता है और अगली कक्षा में दाखिला ले लेता है। वैसे भी भट्ट और कलसी गिली डंडा खेले या चोर सिपाही क्या फरक पड़ता है!

पांडेय जी अपनी दुनिया में पहले से ज्यादा खुश भी है और प्रसन्नचित्त भी। 

तभी डोरबेल बजी। पांडेय जी ने कैमरे से पूछ लिया कौन है! जवाब मिला चीकू के नाम से टीशर्ट है, पांडेय जी ने बटन खोल दिया, कूरियर वाला आया और पांडेय जी ने भुगतान कर दिया और सोचने लगे, ये मोबाइल भी किसी दुश्मन ने ईजाद किया होगा, जिसने मां बाप का शनिवार और संडे रहना भी दूभर कर दिया, एक तो लाट साहब सो कर उठेंगे नहीं और ऊपर से उनके सामान का भुगतान करते फिरो। 

अब दो दिन से रामप्यारी भी खामोश है, जब से हरिद्वार की गंगा में बहती गाड़ियों को देखा है, पहले तो रट लगाई हुई थी, चलो जी हो आते है। 

पांडेय जी ने सोचा और मन ही मन में कहा, भगवान जो करता है वह अच्छे के लिए ही करता है।