शोक सभाएं तो पहले भी होती थी मगर तीसरे या तेरहवीं के दिन। शोक सभा में बस इतना होता था कि मृतक की फोटू पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते, दो मिनट का मौन होता और 'और आइए या जाइए' कहे बगैर सभी अपने-अपने मार्ग से निकल जाते। अब दो मिनट के मौन की जगह दो शब्दों ने ले ली है। इन दो शब्दों के आगे अकेला मौन, बेचारा मौन खड़ा है। इतना ही नहीं यह पुण्य कार्य मरने वाले के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद मुक्तिधाम पर ही संपन्न होने लगा है। चट स्वर्गवास पट श्रद्धांजलि टाइप। उधर मुखाग्नि दी नहीं और इधर मुखाग्नि ठंडी करने वाले तैयार। मुख ढीला-कमर टाइट। मुखाग्नि से पंच लकड़ी देने तक के अवकाश का इससे बेहतर उपयोग भला और क्या हो सकता है? कुछ क्षेत्रों में तो इस दौरान अंतिम यात्रा में साथ जानेवालों को तीरथ भोजन करवाने का भी चलन है। इस हेतु 'सीधा' माने बना बनाया खाना यथा सेवचूड़ा,बूंदी के लड्डू वगैरह खिलाए जाते हैं। बताते हैं कि यह भोजन स्वर्गपथ में सीधे मृतात्मा को प्राप्त होता है। फिर क्या! लोग अपने लिए नहीं मृतात्मा के लिए दबे हाथ माल सूतते हैं। कई बार सोचने में आता है कि भूखों मर-मर कर मर जाने वाली आत्माएं सैकड़ों लोगों को करवाए गए भोजन को कैसे पचा पाती होगी!
विशेषज्ञ प्राणियों की जरूरत जीवन के साथ ही नहीं जीवन के बाद भी पड़ती है। यह अंतिम यात्रा के समय देखने में आता है जब अर्थी और चिता सजाने वाले विशेषज्ञों के साथ शोक सभा में दो शब्द कहने वाले विशेषज्ञों द्वारा मोर्चा संभाला जाता है। दो शब्द कहने वाले शहर से लेकर हर गांव खेड़े में मिल जायेंगे। एक बात तो है जब से सोशल मीडिया आया है हर आदमी थोड़ा बहुत लिखने-पढ़ने, देखने और बोलने लगा है। वरना तो यह आदत कहीं पीछे छूटते चली जा रही थीं। मस्तराम जी शोक सभाओं में दो शब्द कहने के लिए जाने जाते थे। कभी तो लगता जैसे वे इसी काम के लिए बने हों। वे जहां भी जाते मृतक से रिश्ता बना लेते 'बोल्डी मसाले' की तरह। जिससे जीवन में कभी मिले ही नहीं उससे जुड़े संस्मरण भी ऐसे सुनाते गोया बरसों साथ रहे हों। हालांकि यह भी एक कला है, जिसमें वे प्रवीण थे।
तो हुआ यूं कि मन और आत्मा से बहुत पहले गुजर चुके एक भिया कल आखिरकार तन से भी गुजर गए। "प्रकृति का नियम है कोई कितना भी गया गुजरा हो या कर गुजरा एक न एक दिन सभी को गुजरना ही पड़ता है।" भिया की अंतिम यात्रा निकली, स्वाभाविक है भारी भीड़ तो होनी ही थी। कोई लेखक वगैरह मरा होता तो बात अलग होती। 'साथ' हो या 'बारात' लोग 'मुंह देखकर जाते हैं।' भारी भीड़ देख मस्तराम जी भयंकर भावों से भर गए। इन भावों को भुनाने के लिए शोक सभा से बेहतर मंच नहीं हो सकता था। कंवार की धूप में मुक्तिधाम पर शोक सभा रखी गई। दो शब्द कहने के लिए मस्तराम जी चले तो फिर चलते ही चले गए। करते भी क्या भिया का कृतित्व और व्यक्तित्व ही ऐसा था। उन्होंने बताया भिया का जीवन हमारे लिए प्रेरणादाई है। भिया का जाना क्षेत्र के लिए अपूरणीय क्षति है। वैसे किसी भी बल्लम व्यक्तित्व वाले भिया का जाना उस क्षेत्र के लिए हमेशा अपूरणीय क्षति हुआ करती है जिसे सिर्फ उनकी पत्नी या पुत्र, पुत्री द्वारा ही पूर्ण की जा सकती है।
बहरहाल, मस्तराम जी दो शब्द 'ओम शांति' कहकर अपनी बात समाप्त करते इससे पहले ही एक बंदा मूर्छित होकर धड़ाम से गिर पड़ा। उसे मूर्छित होकर गिरना ही था। जिन्हें मूर्छा न आई वे सौभाग्यशाली थे या फिर इम्यूनिटीवान वे ही जाने। क्योंकि कंवार की गर्मी और स्वर्गवासी भिया पर दो शब्द किसी के भी श्रीमुख से दो शब्द 'हे राम' निकलवाने के लिए पर्याप्त थे। मूर्छात्मा को अस्पताल ले जाया गया। सुना है उसकी हालत नाजुक है। इधर मस्तराम जी किसी अनहोनी की आशंका में पुनः दो शब्द तैयार करने में जुट गए हैं।