सूचना मिली कि वे मर गए हैं। बाहर जून की गरम भरी दोपहर थी और वे मर गए थे। बाहर मुहावरे में ही नहीं, हकीकत में आग बरस रही थी। वे दिल्ली जैसे महानगर में मरे थे जहाँ किसी मरे हुए की अर्थी को कंधा देने जाने के लिए सड़क पर बार-बार मरने से बचना पड़ता है। एयरकंडीशनर का आदी हो चुका शरीर बिन एसी के अधमरा हो जाता है। लू के थपेड़े आपको अधमरा कर ही देते हैं। वैसे एक लाभ है— मरे हुए आदमी की अंत्येष्टि में अधमरा होकर जाया जाए तो लगता है कि आप बहुत दुखी हैं। वे दिल्ली के दूसरे कोने में मरे थे, तीस किलोमीटर दूर। ये दोनों बूढ़े पेंशनधारी हैं। पेंशन दवाई खाने में अधिक खर्च होती है, खाने-पीने में कम। पर जाना तो है वरना बिरादरी क्या कहेगी। बूढ़े ने अनमने ढंग से कहा, “चलें?”
बुढ़िया के घुटनों के दर्द ने पूछा, “जाना होगा? बाहर कितनी लू चल रही है... इतनी गरमी में... झुलस जाएँगे...”
“भाग्यवान! बिरादरी के थपेड़े इस लू से ज्यादा झुलसाते हैं। यह लू तो चली जाएगी, पर बिरादरी की लू पूरी उम्र थपेड़े मारती रहेगी। दूर फॉरेन में बैठे हमारे बच्चे भी झुलसाए जाएँगे।”
वे अपनी अनिच्छा और बिरादरी की इच्छा से चले। टैक्सी की औकात नहीं थी, बस में धक्के खाने की हिम्मत नहीं थी सो उन्होंने ऑटो ले लिया। ऑटो में लू चारों दिशाओं से वैसी ही आक्रमण करती है जैसे चुनाव में उसकी गरमी। जो मरे थे वे जे. जे. कालोनी के दो कमरों के मकान में अपने कुनबे के साथ रहते थे। झुग्गी-झोंपड़ी कालोनी का श्मशान भी निवासियों की तरह गरीब होता है। न पंखा और न बैठने का उचित स्थान। लाश को निबटाने का मन करता है। पॉश कॉलोनियों का श्मशान भी पॉश होता है। यहाँ बार-बार मरकर आने का दिल करता है। शवयात्रा में आई सुंदरियों से शोभा बढ़ जाती है। जमीन पर बिछी दरियों पर बैठे सहमे-से विवश लोग— धूप की तेज़ी को रोकने के लिए, अपनी मौत को रोकने को विवश, किसी गरीब किसान-सा तना शामियाना। थके-हारे दोनों बूढ़े पेंशनधारी, पानी के दो गिलास गटककर, गरम शामियाने के अंदर बैठ गए थे।
कैसे मरे? क्या हुआ था? यह सब कैसे हो गया? कल तक तो ठीक थे— जैसे प्रश्नों के बाद एक चुप्पी। अब कोई कितनी देर तक मरे हुए आदमी की बात करे। ताज़ा मौत हुई थी और शव अभी पड़ा था इसलिए आवाज़ ऊँची नहीं उठ सकती थी। बड़ी लड़की हरिद्वार में रहती थी। उसे तार दे दिया गया था। शव बर्फ की सिल्लियों के बीच रखा हुआ था। इतनी तेज़ गरमी में चार-पाँच घंटे भूखे रहना तो संभव था, पर सूखते गले को सहना कठिन था। एक टब में पानी भरकर बर्फ डाल दी गई थी। गिलासों को धोने, उन्हें रखने-उठाने की आवाज़ उदास चुप्पी को तोड़ रही थी। कभी-कभी पानी की चाह में अपराध-बोध सी ग्रस्त आवाज़ें बिखरी हुई थीं। औरतों के बीच घिरी शव की पत्नी का विलाप अब हिचकियों में बदल गया था।
बड़ी लड़की के इंतज़ार में लोग धूप में जल रहे थे। प्रतीक्षारत लोगों को मरने वाले के मरने का दुख कम हो गया था और लड़की के अब तक न आने का दुख बढ़ रहा था। उदासी बेचैनी में बदल रही थी। बहुत देर तक जमीन पर घुटने मोड़कर न बैठ पाने वाले दर्दिया रहे थे। बतरसियों को चुप्पी खल रही थी। धीरे-धीरे लोगों ने परिचितों के पास सिमटकर फुसफुसाहट में बतियाना शुरू कर दिया। लाश बर्फ में लिपटी पड़ी थी। गरमी के कारण पीने का पानी कम पड़ रहा था। उम्मीद नहीं थी कि इतना इंतज़ार करना पड़ेगा। हरिद्वार से टैक्सी दिल्ली के बॉर्डर तक तो ठीक आई पर दिल्ली में घुसते ही जाम में फँस गई थी। सबके हृदय गरमी की लू के कारण स्तब्ध थे। दूर-दूर तक कोई नहीं दिखाई दे रहा था जैसे चुनाव हारी हुई पार्टी के कार्यालय में दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आता।
बूढ़ा बोर हो रहा था। वह बहुत जल्दी बोर हो जाता है। वैसे भी यह समय उसके पसंदीदा सीरियल का था। अचानक उसने दो बच्चों को दौड़ते हुए अपनी तरफ़ आते देखा। उसने अपना ध्यान इधर लगा दिया। दोनों में जैसे पहले पहुँचने की होड़-सी लगी हुई थी। एक बारह-चौदह वर्ष का होगा और दूसरा सात-आठ वर्ष का लगभग। उस भीषण गरमी में न जाने किस उम्मीद में वे इस ओर भागते हुए आ रहे थे। बड़ा लड़का पहले पहुँचा। उसने जैसे ही शव को बर्फ की सिल्ली पर पड़े देखा, सहमकर रुक गया। उसने अपने सिर पर हाथ रख लिया था। छोटा भी पहुँच गया और उसने प्रश्नवाचक आँखों से बड़े की ओर देखा। बड़े लड़के ने छोटे का हाथ उसके सिर पर रख दिया। दोनों के चेहरे बता रहे थे कि उन्होंने कुछ अनहोना देखा है। वे किसी उम्मीद में दौड़ते हुए आए थे। शायद शामियाना लगा देखकर उन्होंने सोचा होगा कि कोई शादी-ब्याह है। दोनों भागने के कारण हाँफ रहे थे। बड़े ने नेकर और कमीज़ पहनी हुई थी और छोटा नेकर में था। दोनों नंगे पैर थे और सिर पर हाथ रखे भीड़ को घूर रहे थे। नंगे पैर जलने लगे तो दोनों छाँह में खड़े हो गए। उनके लिए वहाँ रुकना आवश्यक नहीं था, पर शायद एक आतंकपूर्ण विवशता थी या फिर इतनी धूप में दौड़कर आने के कारण वे वापस लौटने का साहस खो चुके थे। आते समय तो कुछ मिल जाने की उम्मीद थी, पर जाते समय... छोटे लड़के को शायद प्यास लग आई थी। वह धीरे-धीरे पानी पीने के लिए उस ओर बढ़ रहा था, जहाँ पानी का टब पड़ा था। वहाँ पहुँचकर उसने हथेलियों से ओक बनाकर पानी माँगा था, पर उस अधनंगे वीभत्स बच्चे को सामने देखते ही वहाँ खड़े सज्जन ने उसे डाँट दिया था। प्यास की विवशता में जब छोटे लड़के ने दोबारा पानी माँगा तो वे सज्जन दाँत पीसते हुए उसे मारने को दौड़े-से थे। बर्फ का ठंडा पानी बैठे हुए लोगों के लिए था, न कि उस आवारा लड़के के लिए। छोटा लड़का विवश, निराश-सा बड़े के पास खड़ा हो गया था, उसके होंठ सूख रहे थे और वह उन्हें बार-बार जीभ फेरकर तर कर रहा था।
इस बीच प्रतीक्षा ख़त्म हो गई थी। बेटी आ गई थी। शव को नहलाने के लिए उसे बर्फ की सिल्लियों में से निकाला गया। बर्फ की सिल्लियों को पास की सूखी नाली में लुढ़का दिया गया था। छोटे लड़के ने जीभ से एक बार फिर होंठों को तर किया था।
‘राम नाम सत्य’ की आवाज़ से अर्थी उठी। ‘राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत है।’
एक निष्प्राण देह जीवित लोगों की बिरादरी से उठ रही थी। तभी मैंने उस छोटे लड़के को देखा। वह नाली में फेंकी गई बर्फ का एक टुकड़ा उठाकर चूस रहा था। उसका दूसरा हाथ उसके सिर पर था।
बड़े ने उसे डाँटा— “फेंक इसे, ये मुर्दे की बर्फ है।”
छोटे ने चूसते हुए कहा— “बर्फ झूठी थोड़े होती है।”
-प्रेम जनमेजय