मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 26
माँ कह एक कहानी
"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
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बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
मातृ-मन्दिर
भारतमाता का यह मन्दिर, समता का संवाद यहां,
सबका शिव-कल्याण यहां है, पावें सभी प्रसाद यहां।
नहीं चाहिये बुद्धि वैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहां,
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सबका शिव-कल्याण यहां है, पावें सभी प्रसाद यहां।
नहीं चाहिये बुद्धि वैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहां,
अर्जुन की प्रतिज्ञा
उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा,
मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।
मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
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मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा।
मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ,
मैथिलीशरण गुप्त की बाल-कवितायें
मैथिलीशरण गुप्त यद्यपि बालसाहित्य की मुख्यधारा में सम्मिलित नही तथापि उन्होंने कई बाल-कविताओं से हिन्दी बाल-काव्य को समृद्ध किया है। उनकी 'माँ, कह एक कह...
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सरकस | बाल-कविता
होकर कौतूहल के बस में,
गया एक दिन मैं सरकस में।
भय-विस्मय के खेल अनोखे,
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गया एक दिन मैं सरकस में।
भय-विस्मय के खेल अनोखे,
मेरी भाषा
मेरी भाषा में तोते भी राम-राम जब कहते हैं,
मेरे रोम-रोम से मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं।
सब कुछ छूट जाए, मैं अपनी भाषा; कभी न छोडूँगा।
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मेरे रोम-रोम से मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं।
सब कुछ छूट जाए, मैं अपनी भाषा; कभी न छोडूँगा।
भारत-भारती
यहाँ मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती को संकलित करने का प्रयास आरंभ किया है। विश्वास है पाठकों को रोचक लगेगा।
'भारत-भारती' की प्रस्तावना में स्वयं गुप्तजी ?...
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'भारत-भारती' की प्रस्तावना में स्वयं गुप्तजी ?...
मंगलाचरण | उपक्रमणिका | भारत-भारती
मंगलाचरण
मानस भवन में आर्य्जन जिसकी उतारें आरतीं-
भगवान् ! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
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मानस भवन में आर्य्जन जिसकी उतारें आरतीं-
भगवान् ! भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
भारत वर्ष की श्रेष्ठता | भारत-भारती
भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ?
फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है ,
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फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ ।
सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है ,
हमारा उद्भव | भारत-भारती
शुभ शान्तिमय शोभा जहाँ भव-बन्धनों को खोलती,
हिल-मिल मृगों से खेल करती सिंहनी थी डोलती!
स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ,
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हिल-मिल मृगों से खेल करती सिंहनी थी डोलती!
स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ,
नर हो न निराश करो मन को
नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
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कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
हमारे पूर्वज | भारत-भारती
उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,
गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है ।
वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
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गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है ।
वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
उत्तर प्रदेश के प्रति | कविता
उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!
संत प्रश्न लेकर आए हैं सहकर कितना काय-क्लेश।
कैसे भूमि-समस्या सुलझे,
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संत प्रश्न लेकर आए हैं सहकर कितना काय-क्लेश।
कैसे भूमि-समस्या सुलझे,
आदर्श | भारत-भारती
आदर्श जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए ?
सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए ।
हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे ।
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सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए ।
हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे ।
आर्य-स्त्रियाँ
केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,
गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा ।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
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गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा ।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
हमारी सभ्यता
शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे ।
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
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निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे ।
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
होली - मैथिलीशरण गुप्त
जो कुछ होनी थी, सब होली!
धूल उड़ी या रंग उड़ा है,
हाथ रही अब कोरी झोली।
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धूल उड़ी या रंग उड़ा है,
हाथ रही अब कोरी झोली।
अपनी भाषा
करो अपनी भाषा पर प्यार।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार।।
जिसमें पुत्र पिता कहता है, पत्नी प्राणाधार,
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जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार।।
जिसमें पुत्र पिता कहता है, पत्नी प्राणाधार,
रवि
अस्त हो गया है तप-तप कर प्राची, वह रवि तेरा।
विश्व बिलखता है जप-जपकर, कहाँ गया रवि मेरा?
- मैथिलीशरण गुप्त
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विश्व बिलखता है जप-जपकर, कहाँ गया रवि मेरा?
- मैथिलीशरण गुप्त