परेशान थी वह। परेशानियों जैसी परेशानी थी। दिल में एक दर्द जमा बैठा था। पिघलता ही नहीं। आकाश से बर्फ गिरती है। दो-तीन दिन में पिघल जाती है। किंतु कैसी पीड़...
वह आज भी खड़ी है... वक्त जैसे थम गया है... दस साल कैसे बीत जाते हैं... इतने वर्ष.... वही गाँव...वही नगर...वही लोग... यहाँ तक कि फूल और पत्तियां तक नहीं बदले। टूलिप्स सफे?...
ट्रक को आते देख कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह इतनी ख़ुश थी कि अपनी ख़ुशी को व्यक्त करने के लिए उसे शब्द नहीं मिल रहे थे। बचपन से ही उसका दिल्ली जैसे बड़?...
आज फिर मैंने उन्हें देखा, जिन्हें मैं पिछले तीन वर्षों से देखती आई हूँ, किंतु बात करने का अवसर नहीं मिला, या यूँ कहो साहस ही नहीं जुटा पाई।
वैसे तो उसी मॉ?...