
अरुणा सब्बरवाल का जीवन परिचय
अरुणा सब्बरवाल का जन्म 18 अगस्त, 1946 को दिल्ली (भारत) में हुआ। आप कई दशकों से यू.के. की निवासी हैं। अरुणा सब्बरवाल ब्रिटेन (यू.के.) में बसी एक प्रतिष्ठित प्रवासी हिंदी लेखिका हैं। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के संगम को अपनी रचनाओं में उकेरने वाली अरुणा जी ने हिंदी साहित्य में, विशेषकर 'प्रवासी साहित्य' में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। लगभग 25 वर्षों तक इंग्लैंड के विभिन्न स्कूलों में अध्यापन किया। वर्तमान में अपना समय लेखन, चित्रकला और साहित्य सृजन को समर्पित करती हैं।
शिक्षा
अरुणा जी की प्रारंभिक शिक्षा भारत में हुई, जहाँ वे छात्र जीवन से ही एन.सी.सी. और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों में सक्रिय रहीं। अरुणा जी देहली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और इन्होंने बर्मिंघम यूनिवर्सिटी से पोस्ट-ग्रेजुएशन किया। इसके अतिरिक्त प्रयाग संगीत समिति से संगीत विशारद किया।
साहित्यिक यात्रा
अरुणा सब्बरवाल की साहित्यिक यात्रा की शुरुआत औपचारिक रूप से 2008 के आसपास हुई। उनकी पहली कहानी 'वे चार परांठे' प्रसिद्ध पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' में प्रकाशित हुई थी, जिसे पाठकों और आलोचकों द्वारा खूब सराहा गया। उन्होंने ब्रिटेन की साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई है। 'गीतांजलि' और 'कथा यू.के.' जैसे मंचों से जुड़ी रही हैं।
प्रमुख कृतियाँ
अरुणा सब्बरवाल की लेखनी गद्य और पद्य दोनों विधाओं में सशक्त है। उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें निम्न हैं:
कहानी संग्रह
'कहा-अनकहा\' (2010), 'वे चार पराँठे' (2014), 'उडारी' (2017)।
कविता संग्रह
'साँसों की सरगम' (2010), 'बाँटेंगे चंद्रमा' (2011)।
लेखन शैली और विषय
अरुणा जी की कहानियों में मानवीय संवेदनाओं और मनोविज्ञान की गहरी पकड़ दिखाई देती है। उनकी रचनाओं के केंद्र में अक्सर सशक्त, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर नारी पात्र होते हैं। प्रवासी जीवन की चुनौतियों, अकेलेपन और विदेशी परिवेश में भारतीय मूल्यों के संघर्ष का चित्रण उनकी लेखनी की मुख्य विशेषता है। उनकी कहानियाँ जैसे 'लम्हों के साये' और 'परदेस में पतझड़' पाठकों के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।
सम्मान और उपलब्धियाँ
साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित किया गया है, जिनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं:
साहित्यिक संस्कृति परिषद, मेरठ (2008)
अक्षरम 7वां अंतर्राष्ट्रीय हिंदी उत्सव (2008)
लंदन उच्चायोग द्वारा मान-पत्र (2010)
यू.के. हिंदी सम्मेलन, बर्मिंघम (2011)
इसके अतिरिक्त, उन्होंने साहित्य अकादमी (प्रवासी मंच) दिल्ली, जामिया मिलिया इस्लामिया और हंसराज कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी रचनाओं का पाठ किया है।