ललक | कहानी

रचनाकार: अरुणा सब्बरवाल

Lalak-Hindi story by Aruna Sabharwal

आज फिर मैंने उन्हें देखा, जिन्हें मैं पिछले तीन वर्षों से देखती आई हूँ, किंतु बात करने का अवसर नहीं मिला, या यूँ कहो साहस ही नहीं जुटा पाई। 

वैसे तो उसी मॉल में बेंच पर बैठे अनेक बार देखा है उन्हें। यह तो सभी को पता है कि एक महिला को पुरुष से बात की पहल करने से पहले बहुत कुछ सोचना पड़ता है। उसके मन में कई तरह के प्रश्न उठते हैं। ऊपर से समाज के बारे में भी सोचना पड़ता है। जब भी हैरो जाती हूँ तो उसी मॉल के ऊपर फ़ूड कोर्ट में वह और कांति बैठ कर चाय पानी पीते हैं और वहीं वह सज्जन सुबह से ले कर मॉल के बंद होने तक अपनी बड़ी सी ट्रॉली के साथ नीचे दोस्तों के साथ बैठे होते हैं। 

अनेकों बार उसे जिज्ञासा हुईं कि उनसे बात करे, किंतु मन को बरबस रोकना पड़ा क्यूँकि वह सज्जन सदा लोगों से घिरे रहते हैं। उनका वहाँ होना मेरे लिए बहुत बड़ा जिज्ञासा का विषय बन गया है, विशेष रूप से उनका भानुमति का पिटारा, उनकी ट्रॉली। ऐसा लगता है वह सारा घर ही अपने साथ ले कर चलते है। नाम तो मैं उनका नहीं जानती, चलो उन्हें अंकल जी ही बुलाते हैं। अंकल जी एक चकोर सी बड़ी ट्रॉली के साथ दोस्तों से घिरे बेंच पर बैठे होते हैं।

तीन वर्षों में कई बार मैंने अंकल जी को अपनी बड़ी सी ट्रॉली के साथ H-14 बस में चढ़ते देखा है। उन्हें ट्रॉली के साथ देखते ही ड्राईवर उनके लिए रैम्प नीचे कर देता है, और वह अपनी ट्रॉली के साथ जैसे-तैसे चढ़ ही जाते है। उम्र शायद सत्तर की होगी। उनके शरीर पर बाक़ायदा मैला सा गर्म नेहरु कॉलर का अचकन, गले में मैला  सा गरम मफ़लर, और लंदन ट्रांसपोर्ट का फ़्रीडम पास  लटका रहता है। हाँ-हाँ, दस्ताने और सर पर फटी गर्म टोपी तो भूल ही गयी। परतों मैल चढ़ी चौरस ट्रॉली... जिसे शायद कभी साफ़ होने का सौभाग्य नहीं मिला। 

ऊपर तक ट्रॉली भरी होने के साथ-साथ उसके चारों पिल्लर पर प्लास्टिक की थैलियों में कुछ न कुछ सामान टंगा होता है। हाँ, एक वाद्य यंत्र भी टँगा होता है, जो गिटार या ज़ाइलफ़ोन की भाँति लगता है। ट्रॉली में पोर्टेबल कुर्सी भी टंगी रहती है, अगर थक जाएं तो कहीं भी बैठ सकते हैं। वह ट्रॉली ही नहीं, लगता है मानो पूरा घर साथ ले कर चल रहे हों। यह ट्रॉली भी उन्हें गवर्नमेंट से ही मिली है। ट्रॉली मेरे लिए एक बहुत बड़ा रहस्य बनी हुई है। सच कहूँ, केवल ट्रॉली नहीं वो सज्जन भी मेरे लिए रहस्यमयी बनते जा रहे थे। मन में यही जिज्ञासा रहती है कि उनकी इतनी बड़ी चौकोर ट्रॉली में होता क्या है?

लगता था, आज मेरी क़िस्मत खुल ही गयी। अंकल जी को देखते ही बस ड्राइवर ने बस का दरवाज़ा खोल कर रैम्प नीचा किया, बस में चढ़ने के लिये उन्हें थोड़ी जद्दो-जहद तो करनी पड़ी, बस में कोई सीट ख़ाली न होने के कारण उन्हें मेरे पास ही बैठना पड़ा। हिम्मत जुटा कर मैंने उनसे पूछ ही लिया...

”अंकल जी, आप इतनी भारी ट्रॉली क्यों उठाते हैं?”

“इस ट्रॉली में मैं पूरे दिन का खाना पीना ले कर चलता हूँ जैसे...मसाले वाली चाय, पानी, नमकीन... कभी थेपला, कभी खिचड़ी, कभी पराँठे, और ढोकला इत्यादि।

अंग्रेज़ों की फीकी-फीकी डबल-रोटी अच्छी  नहीं लगती। महंगी भी बहुत होती है। मेरी बेटी पूरे सप्ताह का खाना बना कर फ़्रीजर में रख देती है। जब सब काम पर चले जाते हैं। मैं पीछे से अपनी ट्रॉली और ख़ुद तैयार हो कर निकल आता हूँ। अब यह ट्रॉली मेरी जीवन साथी बन चुकी है। उनके जाने के बाद मैं अपना काम ख़ुद ही करता हूँ। ताकी उनके काम में दखल-अंदाजी न हो।”

“एक ही बेटी है?”

“नहीं दो हैं, एक बेटी लंदन से बाहर रहती हैं। वो कभी-कभी आती है मिलने। मैं बड़ी बेटी के साथ रहता हूँ। मेरे पास अपना घर था, मैंने बेचकर उन दोनों को पैसे दे दिए हैं। अपना टैक्स बचाने के लिए, तुम्हें तो पता है, आधे पैसे गवर्मेंट ले लेती है। पचास वर्ष नौकरी की है, भारी टैक्स दिया है। दोनों बेटियाँ बहुत ध्यान रखतीं हैं मेरा।

असल में लड़कियाँ नहीं चाहतीं कि मैं घर में अकेला रहूँ। इसीलिए मैं सुबह अपनी ट्रॉली तैयार कर के निकल जाता हूँ। धन्यवाद गवर्मेंट का, जिसने बस और मेट्रो का फ़्री ट्रेवल का फ़्रीडम पास दिया है (लंदन में अवकाश के बाद गवर्मेंट की और से मेट्रो और बस का फ़्री फ़्रीडम पास मिल जाता है)। अगर बस छूट जाए तो रिंग एंड राइड को फ़ोन करके घर पर बुला लेता हूँ। पैसे भी नहीं लगते। मुझे यहाँ आना बहुत अच्छा लगता है, उसके कई फ़ायदे हैं--पहला घर को गरम रखने के पैसे बचते हैं, दूसरा मैं अच्छे-अच्छे लोगों से मिलता हूँ। बेटियों को चिंता नहीं होती, वो जानती हैं कि अगर अचानक मुझे कुछ हो भी जाये तो मॉल में ऐंबुलेंस बुलाने के लिए बहुत लोग होंगे, मेरे दोस्त भी मिल जाते हैं।”

इतने में हमारा बस-स्टॉप आ गया, दोनों अपने-अपने रास्ते चले दिए। मैंने उनकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया, उन्होंने मदद लेने से इनकार कर दिया। मुझे उनका तर्क अच्छा लगा। अपनी शॉपिंग के पश्चात् मैं और मेरी मित्र कांति फ़ूड कोर्ट में चाय पीने बैठ गये। ऊपर से देखा तो अंकल जी अपने दोस्तों के साथ बहुत मग्न ख़ुशियाँ बिखेरने में लगे थे। उनके चारों ओर दोस्तों के जमघटे को देख कर ख़ुशी हुई। रास्ते भर सोचती रही कि उनमें ऐसा क्या चुंबकीय आकर्षण है जो सदा लोगों से घिरे रहते हैं। घर पहुँचते ही व्यस्तता के कारण बात आई गयी हो गयी।

कई सप्ताह के पश्चात् आज फिर बस में मैंने अंकल जी को चढ़ते देखा, वही अपना भानुमति का पिटारा लिये बस में चढ़ने का प्रयास कर रहे थे। सोचा उसकी सहायता कर दूँ, किंतु हिम्मत नहीं पड़ी। आज उन्होंने रेन-कोट भी डाला था। मेरे साथ एक सहेली भी थी, किंतु मेरा ध्यान तो अंकल जी में ही अटका था। भरी बस होने के कारण, उतरते वक़्त एक नौजवान ने उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, उन्होंने मना कर दिया। जब भी कोई उनकी सहायता के लिए हाथ बढ़ाता है तो उनका स्वाभिमान सामने खड़ा हो आ जाता है। क्या ग़ज़ब का स्वाभिमान है उसमें।

आज सुबह से ही बारिश हो रही थी। मंद-मंद हवा राहत दे रही थी। अंधेरे ने आस पास की दुनियाँ को अपने आग़ोश में ले लिया था। जब मैं अपने एक दो काम समाप्त करके आयी, अंकल जी अकेले ही मॉल के बेंच पर बैठे थे, मेरे लिए अच्छा अवसर था उनसे बात करने का हमारी थोड़ी सी  पहचान  तो हो चुकी थी। उन्हें अकेले देख मैं उनके पास बेंच पर जा कर बैठ गयी।

“नमस्ते अंकल जी, कैसे हो?”

“सारू छै... अंकल जी बड़ी धीमे से बोले “अंकल जी नहीं, धीरू भाई कहो।”

“उनके ढीले से उत्तर से मुझे चिंता होने लगी।”

“धीरू भाई, आज आपकी उदासी का कारण क्या है?” समझ तो मैं गयी ही थी कि आज परेशान हैं, बारिश के कारण उनके दोस्त घर से नहीं निकलेंगे। ऐसा लग रहा था मानो आज उन्हें दिन के अंधेरे और उनके भीतर की उदासी ने घेर लिया था।

“बात तो कोई ख़ास नहीं, लगता है आज अकेले ही दिन बीतना पड़ेगा। बारिश में लोग बाहर आने से हिचकिचाते हैं, कि कहीं अगर फिसल गए तो घरवालों के लिये समस्या खड़ी हो जाएगी।”

“बस इतनी  सी बात है, अभी मिस्टर गूगल से पूछ कर बताती हूँ। मैं जल्दी से मिस्टर गूगल जी से पूछ कर उनकी चिंता का निवारण करते बोली... “चिंता न करें जल्दी ही बारिश रुक जाएगी, और सूरज भी निकल आएगा। तब तक आप मुझे ही अपना दोस्त समझिए।”

कुछ पल संवादहीन गुज़रे... मैं उनकी चुप्पी में भी अर्थ ढूँढने लगी... ऐसा महसूस हो रहा था मानो उनके बाहरी अक्कड़-फक्कड़ व्यक्तित्व के भीतर भावनाओं का शीतल झरना बह रहा हो। वे गहरी  साँस लेते बोले, “मैं खुशकिस्मत हूँ, लोगों के जीवन में तो बहुत कम अच्छे दिन आते हैं। ऊपर वाले की कृपा से मेरी तो सारी उम्र अच्छी गुज़री है।”

इतना कह कर वो अपने संगीत वाद्य की ट्यूनिंग करने में लग गए। ट्यूनिंग करते-करते उसके मस्तिष्क में पत्नी की धुँधली-धुँधली स्मृतियाँ चहल-कदमी करने लगीं। वे ख़ुद ही बड़बड़ाने लगे...“किसी की शादी में मैंने देखा था तेजस को बस... वहीं मर मिटा था उस पर... वो इतनी सुंदर थी कि मैंने जुगाड़ करके उसके बारे में पता लगा ही लिया। वह आर्ट सेंटर में संगीत सिखाती थी। तेजस संगीत की महारथी थी, उसे कोई भी संगीत वाद्य दे दो, दो मिनट के बाद वह कुशलता से बजा लेती थी।

मुझे याद है, उसके जन्म दिवस पर एक मित्र ने उसे बैंजो उपहार में दिया, बस एक दो मिनट अंगुलियों को इधर-उधर चलाने के बाद तेजस उस बैंजो पर सभी धुन बजाने लगी। महसूस होता था कि माँ सरस्वती की उसपर बहुत कृपा थी। जब गाती थी तो ऐसा लगता था जैसे सरस्वती जी उसके गले में वास करती हों। तेजस के संगीत ने मुझे मोह लिया था। यूँ कहो फ़िदा हो गया। उसे मिलने के बहाने मैंने उसकी संगीत की क्लास में दाख़िला ले लिया। फिर हमारा प्यार उड़ान भरने लगा। हमारे विवाह में कोई समस्या नहीं आयी, हम दोनों गुजरात से थे और उम्र गोत्र भी मेल खा गया। बात करते-करते उनका गला भर्राने लगा, आँखें नम हो गयीं, गला साथ नहीं दे रहा था। कंपकंपाते शब्दों से बताया कि पचास वर्षों के पश्चात पत्नी मेरा साथ छोड़ कर चली गयी। ऐसा लगा मानो मेरा जीवन वहीं समाप्त हो गया है, पर तेजस मेरे संगीत में सदा मेरे साथ रहती है, उसकी ख़ुशबू मेरे हर सुर में बसी है। मैं तेजस से अभी भी बातें करता हूँ, भावुकता में कह देता हूँ ‘तुम ही न रहे अब किसे कहूँ कि याद आ रहे हो तुम।' ‘उसी की हिम्मत से मैं ख़ुद को खड़ा कर पाया।' 

तेजस अक्सर कहा करती थी कि तुम्हारे साथ मैं ख़ुद को बुलंद कर सकती हूँ, तुम मेरे प्राण-वायु हो... तुम मेरी ऊर्जा, ढ़ाल और हमसाया बन गए हो। जब कभी उसकी याद आती है तो उसके ख़त पढ़ लेता हूँ। मन ही मन सोचता हूँ, यह कैसा पागलपन है। 

तेजस सदा कहती थी, “धीरू, ज़िंदगी तो हमेशा समय से आगे निकल जाने वाली चीज़ है, न कि ठहरी हुई जन्मपत्री जिसके सारे शब्द संकेतों से भरे होते हैं। शेष आपके सामने है। अब मैं यहाँ समय का सदुपयोग और अपना अकेलापन दूर करने आ जाता हूँ। मन भी लगा रहता है, किसी का भला भी हो जाता है।” धीरे-धीरे उनके मित्र भी आने लगे। मैंने सांत्वना से उनकी पीठ थपथपायी और अपने घर की ओर चल पड़ी। मुझे ख़ुशी इस बात की थी कि धीरू भाई ने अपना मन हल्का कर लिया।

रास्ते भर मैं धीरू भाई के बारे में ही सोचती रही, किन्तु जब मैं अपने आस-पास देखती हूँ तो लगता है, इस संसार में पचास प्रतिशत से अधिक लोगों को अकेलेपन का घुन खा रहा है। मेरी एक मित्र है, वह अकेलेपन से जूझने के लिए तैयार होकर लम्बे से लम्बे रूट की बस में बैठ जाती है, चार पाँच घंटे बसों में घूमती रहती है, शाम को जब बेटा अपने दोस्तों के साथ घर से बाहर चला जाता है तब वह घर जाती है। जब बेटा घर में होता है तो उसे घर से बाहर रहना पड़ता है यह उसकी विवशता है, मुझे कहती है--तुम भी कोशिश करो, अकेलापन भर जाएगा। बस में लोग चढ़ते-उतरते हैं, रौनक़ लगी रहती है।

एक और महिला भी है, जिसने अकेलेपन से जूझने का अपना प्रबंध किया हुआ है। वह दूर-दूर की चैरिटी की दुकान में जा कर सस्ती चीज़ें ख़रीद कर दूसरी चैरिटी की दुकान में जा कर वही चीज़ें दान दे देती है। जब पूछा तो उसने बताया कि इस तरह जीवित इन्सानों से संवाद तो होता है... शाम को तो टेलिविजन के सामने ही बैठना है। गवर्मेंट की तरफ़ से मुफ़्त यात्रा का फ़्रीडम पास तो मिला हुआ है।... एक नहीं ऐसी कई कहानियाँ है। सभी की यही विडंबना है।

अक्सर लोग अवकाश के पश्चात् स्वयं को, बेकार समझने लगते हैं। सोचते हैं, अब उनका इस संसार में क्या काम है। संयुक्त परिवार का लंदन में चलन नहीं है, बच्चे भी अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने में लगे हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि वृद्धों के लिए अगर मुफ़्त का फ़्रीडम पास न हो तो उनके लिये घर से शायद निकलना भी दूभर हो जाए ।

पर हाँ... नीता बहन ने अपनी समस्या का बढ़िया समाधान निकाल लिया है, मस्त रहती है। उम्र शायद सत्तर से ऊपर है, ट्रैम्प सी लगती है किंतु वह सदा अपने अंग्रेज़ साथी के साथ दिखती हैं। नीता बहन को अंग्रेज़ी नहीं आती और अंग्रेज़ को गुजराती नहीं, किंतु सदा एक दूसरे के साथ ही दिखते हैं। एक से दूसरे रेस्टोरेंट में बैठ कर पूरा दिन बिता देते हैं, शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं।

लंदन में बहुत सी समाज सेवी संस्थाएँ हैं, जहाँ तुम अपना समय दान दे सकते हैं। किंतु कभी-कभी आत्मविश्वास की या फिर पढ़ाई की कमी कहो या खुल कर अंग्रेज़ी न बोल सकने के कारण उन्हें उन संस्थाओं का बोध नहीं होता, जो उनके लिए उन संस्थाओं में भाग लेने में एक रुकावट बन जाता है। 

अक्टूबर का महीना चल रहा था, पतझड़ अपने यौवन पर था। सर्दियों का एहसास होने लगा था। उस दिन शिखा ने जैसे ही घर का काम समाप्त किया, उसने बाहर झाँक कर देखा, अचानक पतझड़ की धुंध न जाने कहाँ ग़ायब हो गयी थी। पतझड़  की मरियल सी धूप के कुछ टुकड़े पैटीओ के शीशों से भीतर झाँक रहे थे। वह बाहर निकली उसने प्रकृति का अद्भुत दृश्य देखा, लगभग सभी वृक्ष वस्त्रहीन खड़े शरमा रहे थे। धरती माँ पर पड़े ख़ूबसूरत लाल, संतरी, पीले रंग-बिरंगे पतों का बिछा क़ालीन पतझड़  की शोभा को और बढ़ा रहे थे। वह वहीं खड़ी प्रकृति के नज़ारों को निहारने लगी।
 
दो दिन से बारिश नहीं हुई, शिखा ने सोचा बहुत अच्छा अवसर है गार्डन साफ़ करने का। उसने गार्डन रेक से घास पर पड़े पत्तों को समेटना आरम्भ कर दिया। उसने  सूखे पत्ते एकत्र  कर के खाद बनाने वाले ड्रम में डाल दीये। सोचने लगी क्यों न पतझड़ की आख़री घास काट ली जाए। कल गार्डन के घास उठाने वाले ले भी जाएंगे। मौसम भी साफ़ होने लगा था। कई सप्ताह बीत गये। व्यस्तता के कारण बाहर भी नहीं जा पायी। क्योंकि लंदन में तो मौसम का कोई भरोसा नहीं, आप एक ही  दिन में चारों मौसम का आनंद ले लेते हो। चल पड़ी अपने मिशन पर, हैरो पहुँचते ही उसकी आँखें धीरू भाई को ही ढूँढती रहीं, न बस में न मॉल के बेंच पर, कहीं भी नहीं थे, यहाँ तक कि बेंच भी वहाँ से नदारद थे, पूछे तो किससे पूछे... पूछने की बात भी नहीं थी। कुछ सप्ताह वह दिखाई नहीं दिए।

आज छः सप्ताह बाद धीरू भाई को बस में चढ़ते देखकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। आज उन्होंने गर्म कोट पहन रखा था... भीनी-भीनी सर्दी भी शुरू हो गयी थी। घने बादल छाए थे। दोनों ने एक दूसरे को नहीं देखा। लोगों की भीड़ के बावजूद मेरी नज़रें धीरू भाई पर थी। वे रिज़र्व सीट पर बैठ गये और मैं पीछे। हैरो स्टेशन आते ही जब मैंने उन्हें वहाँ उतरते नहीं देखा। मैं भी बैठी रही, जासूसी करने के लिए। लग गयी उनका पीछा करने। बाहर बारिश होनी आरम्भ हो चुकी थी। अचानक वे हैरो की एक मेथोडिस्ट चर्च में घुसे और मैं पीछे-पीछे। मैं अपना छाता बंद कर के उनके पास जा कर बैठ गयी। भीतर से मैं ख़ुश थी कि अब उन्हें मुझे भगाने की जल्दी नहीं होगी। मुझे देख कर हैरानी से बोले, “तुम यहाँ कैसे?”

मैंने सकपकाते हुए जवाब दिया, “मैं यहाँ मंगल को एक सामाजिक चर्चा के लिए आती हूँ। मगर, आप यहाँ कैसे?”

“पूछो मत, अंग्रेज़ों ने मिल कर काउन्सिल को शिकायत की कि यह लोग जमघट लगाकर लोगों की शांति भंग करते हैं। काउन्सिल ने सुधार  का बहाना बनाकर वहाँ से बेंच उठवा दिए। मेरा उद्देश्य तो समाज सेवा का था। धन्यवाद काउन्सिल का, उन्होंने हमें सड़क पर नहीं छोड़ा। सप्ताह में दो दिन चार-चार घंटे हमारे लिए इस चर्च में निर्धारित किए हैं। यहाँ चाय का प्रबंध भी है, सर्दियों में आराम रहेगा। एक डब्बा रखा है चाय का, चाय बना लो और कुछ पेंस डब्बे में डाल दो। यहाँ मैं ख़ुशी से दोस्तों के साथ संगीत साधना कर सकता हूँ। यहाँ पीयानो भी है। तुम शायद विश्वास ना करो, यहाँ हम खुल कर गा सकते हैं, बजा सकते हैं। हमारे ग्रुप में से कितने छुपे रूस्तम निकले हैं। जो जवानी में मंच पर गाया, बजाया करते थे। कोई माउथ-ऑर्गन बजाता था, कोई हारमोनियम और कोई तबला। सब की योग्यता निखर कर बाहर आ रही है और बहुत ख़ुश है। घर में बच्चों की उनमें कोई दिलचस्पी नहीं, कोई जानना भी नहीं चाहता। संगीत मेरी नस-नस में बसा है, जिस दिन मैंने संगीत छोड़ दिया मैं मर जाऊँगा। वह बार-बार अपनी घड़ी देख रहे थे, शायद मुझे जाने का संकेत दे रहे थे।”

“शेष चार दिन का क्या प्रबंध है? मैंने पूछा?

“वो जो लाइब्रेरी है न हैरो की, दो दिन वहाँ कुछ घंटों के लिए कमरा मिला है। वहाँ हिंदी, गुजराती, बांग्ला का अख़बार भी होता है। हमारे समूह  में कई मेंबर प्रफ़ेशनल हैं जैसे वकील, सोशल वर्कर, प्रोफ़ेसर, डॉक्टर इत्यादि जो अपनी सेवाएँ मुफ़्त में देते हैं। जैसे किसी को पत्र लिखवाना हो, कोई काउन्सिल की समस्या हो, लैंड्लॉर्ड की समस्या हो, समय पर पेंशन न पहुँची हो इत्यादि। सब की समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जाता है। डॉक्टर समझाते हैं, अपना और अपने शरीर का ध्यान रखें, वही अंत तक साथ देगा।

“धीरू भाई शेष दो दिन का क्या प्रबंध है?”

बारिश तेज़ होती जा रही है, धीरू भाई का ध्यान घड़ी पर ही था। वे घड़ी देखते हुए बोले, “लगता है, आज कोई नहीं आएगा।" ...और मैं ख़ुश थी कि अब मैं आराम से  उनसे बात कर सकती हूँ। सोचने लगी, यह अच्छा ही है कि मौसम के पन्ने इनसान के हाथों से बाहर हैं।

“धीरू भाई शेष दो दिन का क्या प्रबंध है?”

“दो आधे दिन हमारे लिए कम्यूनिटी सेंटर में निर्धारित हैं, जहाँ हम अपनी निजी समस्याएँ, अपने विचार, अपने अनुभव बाँट सकते हैं। बच्चों के साथ रहने में विचारों और सोच में विरोधाभास का द्वन्द् तो चलता रहता है, इसी आशा से यहाँ आते हैं कि यहाँ हमारी बात को कोई तो सुनता है, समझता है। इसके अतिरिक्त अगर कोई कविता लिखता है, सब को सुनाना चाहता है। उसे प्रोत्साहित किया जाता है। छोटा सा जन्म दिवस भी मना लेते हैं।”

“जैसे आज आपके कोट पर चिपका स्टिकर ‘ए बर्थ डे बॉय' जो मैंने देख लिया था। वो मेरी बात सुनी-अनसुनीकर बोलते गये। अंग्रेज़, रोमेनीयन, अफ़्रीकन... कोई भी आ सकता है। जितने हम अकेले हैं, यह लोग हम से भी अधिक अकेले हैं। भाषा की तो कोई समस्या नहीं होती, अंग्रेज़ी तो सभी बोल लेते हैं। हमारा यह समूह बढ़ता जा रहा है। मनुष्य के लिए सामाजिक मेल-जोल, आदान-प्रदान अत्यंत ज़रूरी है। यही हमारा ध्येय है। आज कम्पयूटर का दौर है, जहाँ सम्वेदनाओं के लिये समय ही नहीं बचा। किसी भी काम को सही ढंग से करने के लिये उसके साथ रागात्मक सम्बंध का स्थापित होना ज़रूरी है। घर से यहाँ आ जाने पर मुझे अच्छा लगता है। मैं सबके लिए बहुत ख़ुश हूँ।”

“धीरू भाई जी इतनी समाज सेवा करके तो आप स्वर्ग में जाएंगे। मेरे विचार से तो आप समाज सेवा के साथ-साथ उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।”

“मार्गदर्शन...? इस उम्र में मार्गदर्शन...? मार्गदर्शन सिद्धांतों से लिया जाता है, मनुष्यों से नहीं। मनुष्य तो मर जाता है, सिद्धांत हमेशा ज़िंदा रहते हैं।”

“मैं कौन होता हूँ, सेवा करनेवाला और मार्ग दिखाने वाला? वो है न... हमारा ऊपर वाला। मैं तो बस अवकाश के बाद यह अनमोल जीवन जीने की कोशिश कर रहा हूँ। ऊर्जा और ख़ुशियाँ बाँटता हूँ, मेरे साथ जात-पात धर्म का कोई भेद-भाव नहीं, कोई बंधन नहीं है। यहाँ कोई भी आ सकता है। जो समाज ने मुझे दिया है, समाज को लौटा रहा हूँ। मेरे जीवन में तो हर दिन उत्सव है। कैसी शक्तिशाली प्रवृत्ति होती है मानव में, समझौतों की। वह हर स्थिति पर विजय पा ही लेता है। आधुनिकता में वैयक्तिकता इतनी बढ़ गयी है कि सब अपने-अपने लिये ज़िम्मेवार हैं। मैं ख़ुशनसीब हूँ, मेरा स्वस्थ शरीर है। मेरे पास संगीत है और सुनने वाले मेरे दोस्त। माँ-बाप ने पढ़ा दिया था। ये धरती और इसके लोग ही मेरा परिवार है।” 
“मेरे लिए सारा संसार 'वासुधैव कुटुम्बकम' है।”

“धीरू भाई जी, तो हो जाए आज आपका हैपी बर्थ डे “इक्कीस" के तो हो गये होंगे। आपके कोट पर लिखा है।”

“कई बार इक्कीस का हो चुका हूँ, मैं आज छियानवे वर्ष का नौजवान यानी कि... नाइंटी सिक्स ईयर यंग मैन।”

“कोई इच्छा, कोई ललक रह गयी है क्या?”

“बस एक ललक 'किंग चार्ल्स की टेलीग्राम' के इंतज़ार में हूँ। सुना है, इस देश में अगर कोई सौ साल तक जी लेता है तो उसके सौवें जन्मदिन पर महारानी का बधाई संदेश आता है।”

धीरू भाई के सपनों का आसमान बहुत बड़ा है।

-अरूणा सब्बरवाल, यू. के
 ई-मेल : arun.sabharwal45@gmail.com