चाहता था आ बसे माँ भी यहाँ, इस शहर में।
चींचीं चींचीं कर के तो मैं चिड़िया तो नहीं
जिसे रौंदा है जब चाहा तब जिसका किया है दुरूपयोग, सबसे ज़्यादा। जब चाहा तब
कितनी जिद्दी हो तुम मक्खी अभी उड़ाती फिर आ जाती! हां मैं भी करती हूं लेकिन
रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे दूध बिलोने से पहले माँ
माँ मुझको अच्छा लगता जब मुझे बांधती दीदी राखी तुम कहती जो रक्षा करता
दिविक रमेश की बाल कविताएं।
अरे क्या सचमुच गुम हो गई मेरी प्यारी-प्यारी बॉल? कहां न जाने रखकर मैं तो
अच्छी पुस्तक बगिया जैसी होती है मुझको तो लगता। कविता और कहानी उसमें
सुनहरी पृथ्वी सूरज रातभर
एक बच्चा खेल रहा है दूसरा खिला रहा है।
छुट्टियों के आने से पहले हम तो लगते खूब झूमने। कह देते मम्मी-पापा से
वे जिनके पास कोई घर नहीं अकसर उन्हीं के पाcस
अपनी अपनी ले सौगातें आओ महीनों आओ घर। दूर दूर से मत ललचाओ
अच्छी लगती हमें जनवरी नया वर्ष लेकर है आती। ज़रा बताओ हमें फरवरी
चटख मसाले और अचार कितना मुझको इनसे प्यार! नहीं कराओ इनकी याद
सब कहीं ले जा सकते हम! कितना अच्छा होता न तब? और समुद्र सिर पर ढ़ोकर
कभी कभी मन में आता है क्यों माँ दीदी को ही कहती साग बनाओ, रोटी पोओ ?
बड़ी हो गई अब यह छोड़ो नानी गाय, कबूतर उल्लू अरे चलाती मैं कम्प्यूटर