दिविक रमेश साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 20

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माँ गाँव में है

चाहता था
आ बसे माँ भी
यहाँ, इस शहर में।

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बन जाती हूं

चींचीं चींचीं
कर के तो मैं
चिड़िया तो नहीं

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सोचेगी कभी भाषा

जिसे रौंदा है जब चाहा तब
जिसका किया है दुरूपयोग, सबसे ज़्यादा।
जब चाहा तब

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जिद्दी मक्खी

कितनी जिद्दी हो तुम मक्खी
अभी उड़ाती फिर आ जाती!
हां मैं भी करती हूं लेकिन

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माँ

रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे
दूध बिलोने से पहले
माँ

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जब बांधूंगा उनको राखी

माँ मुझको अच्छा लगता जब
मुझे बांधती दीदी राखी
तुम कहती जो रक्षा करता

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छुट्कल मुट्कल बाल कविताएं

दिविक रमेश की बाल कविताएं।

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मेरी बॉल

अरे क्या सचमुच गुम हो गई
मेरी प्यारी-प्यारी बॉल?
कहां न जाने रखकर मैं तो

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शब्द शब्द जैसे हों फूल

अच्छी पुस्तक बगिया जैसी
होती है मुझको तो लगता।
कविता और कहानी उसमें

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दिविक रमेश की चार कविताएँ

सुनहरी पृथ्वी
सूरज
रातभर

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दो बच्चे 

एक बच्चा खेल रहा है 
दूसरा 
खिला रहा है। 

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आओ चलें घूम लें हम भी

छुट्टियों के आने से पहले
हम तो लगते खूब झूमने।
कह देते मम्मी-पापा से

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जय जय भारत देश | कविता

वे 
जिनके पास कोई घर नहीं
अकसर उन्हीं के पाcस 

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आओ महीनो आओ घर | बाल कविता

अपनी अपनी ले सौगातें
आओ महीनों आओ घर।
दूर दूर से मत ललचाओ

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खेल महीनों का | बाल कविता

अच्छी लगती हमें जनवरी
नया वर्ष लेकर है आती।
ज़रा बताओ हमें फरवरी

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डर भी पर लगता तो है न | बाल कविता

चटख मसाले और अचार
कितना मुझको इनसे प्यार!
नहीं कराओ इनकी याद

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कितना अच्छा होता न तब | बाल कविता

सब कहीं ले जा सकते हम!
कितना अच्छा होता न तब?
और समुद्र सिर पर ढ़ोकर

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मैं पढ़ता दीदी भी पढ़ती | बाल कविता

कभी कभी मन में आता है
क्यों माँ दीदी को ही कहती
साग बनाओ, रोटी पोओ ?

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दीदी को बतलाऊंगी मैं | बाल कविता

बड़ी हो गई अब यह छोड़ो
नानी गाय, कबूतर उल्लू
अरे चलाती मैं कम्प्यूटर

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डर भी पर लगता तो है न

चटख मसाले और अचार
कितना मुझको इनसे प्यार!
नहीं कराओ  इनकी   याद

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दिविक रमेश का जीवन परिचय