वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
तुमने मुझको देखा...
तुमने मुझको देखा मेरा भाग खिल गया ।
मेघ छ्टे सूरज निकला हिल उठीं दिशाएं,
दूर हुईं पथ से बाधा मनसे चिंताएं,
तुमने अंक लगाया मेरा शाप धुल गया ।
केंचुल छूटी आज नया मैं रूप रहा धर
ज्योति हृदय के भीतर ज्योति हृदय के बाहर,
तुम मुस्काए सपनों को आकार मिल गया ।
धरती के नूपुर नभ की बांसुरिया बाजे,
मेरे आगे खुलते से जाते दरवाजे,
तुम कुछ बोले मुझको जीवन सार मिल गया ।
श्री गिरिधर गोपाल
[ राष्ट्र भारती, नवंबर 1953]
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