वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
मैं तुम्हारी बांसुरी में....
मैं तुम्हारी बांसुरी में स्वर भरूँगा ।
एक स्वर ऐसा भरूँ कि तुम जगत को भूल जाओ;
एक स्वर ऐसा भरूँ कि चंद्रको तुम चूम आओ,
स्वर -सुधा तुममें बहाकर, ताप सब पल में हरूँगा ।
स्वर भरूँगा।।
तार कुछ ऐसे मिले कि स्वर्ग तुम भू पर उतारो,
मरण को देखकर चुनौती स्नेह से जीवन सँवारो;
जागरण की ज्योति से मैं तब तुम्हें ज्योतित करूंगा।
स्वर भरूँगा।।
दूर, - उस ध्रुवतारिका में लक्ष्य तुम अपना निहारो;
प्रेम-गंगा में नहा कर, मुक्ति का घूँघट उघारो,
मुग्ध बासंती पवन बन सुरभि-घन तुम पर मरूंगा।
स्वर भरूँगा।।
ज्वार कुछ ऐसा उठे जो दो तत्वों को एक कर दे;
प्यार की अठखेलियां से, मृत्यु का अभिषेक कर दे;
मिलन का मधु-पर्व होगा, और मैं तुमको वरुंगा।
स्वर भरूँगा।।
मैं तुम्हारी बांसुरी में स्वर भरूँगा ।
- नर्मदा प्रसाद खरे
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