हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

माँ तो आखिर माँ होती है (विविध)

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Author: रश्मि चौधरी ‘प्रभास’

माँओं का काम ही क्या है? रोज सुबह मुर्गे की बांग के साथ ही उठाने लगती हैं बच्चों को। हमेशा ही सात बजे को नौ बजा बताती हैं और भोर को दोपहर बताती हैं।  बच्चों ने भी वर्षों से सुन-सुनकर अपने दिल और दिमाग को न केवल उसी ढंग से फिक्स कर लिया है बल्कि उसी ढंग की बॉडी क्लॉक भी बना ली है भीतर ही भीतर। चादर में लिपटे उनके ऊंघते हुए कान सुनते हैं कि अच्छा दोपहर है तब तो और सोना है। अच्छा नौ बज गए तो अभी थोड़ी देर और सही। माँ  कहती है कि जीवन पंछियों की भांति होना चाहिए शाम होते ही शयनकक्ष में और भोर होते ही डाली-डाली चीं-चीं–चूं-चूं और तिनका-भुनगा टैं-टैं –टूं-टूं।  ऐसे में माँ  जुगत लगाती है कि कैसे हमारे लाड़ले भारत कुमार को उठाया जाए।  चार पांच छेदों से सुशोभित ढक्कन वाली बोतल पानी से भर कर रात में याद से फ्रिज में रख देती है कि उससे भारत पर सुबह-सुबह बौछार की जा सके लेकिन बौछार भी निराश होकर धम्म से धरती पर बैठ जाती है। अगली जुगत पंखा, कूलर बंद करने की है लेकिन खर्राटे लेते भारत पर कोई असर नहीं। तरह-तरह के पकवान की सुगंध और नाक में चिड़िया के पंख से गुदगुदी भी बेकार पड़ जाती है। खैर! वह अपने भारत को दशकों से समझाती रही थी कि देखो गलत लोगों को दोस्त मत बनाना।

“कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर, खांड़, भोजन मिले साकट संग न जाय॥" 

अर्थात सज्जनों के साथ यदि जौ की भूसी की रोटी या सादा भोजन भी मिले तो प्रेम से ग्रहण करना लेकिन दुष्ट के साथ पकवान मिले तो उनके साथ नहीं रहना चाहिए। लेकिन भारत का दिल है कि मानता नहीं। अब ऐसे कोरोना संकट काल में क्या संगत होगी तो डिजिटल इंडिया जिंदाबाद! भारत का लैपटॉप, टेबलेट, मोबाइल भला तथा बिस्तर और पकवान भले।

माँ  समझाती है कि “आंखें खराब हो जाएंगी। दूरदृष्टि तो छोड़ तुझे पैरों तक का भी दिखाई देना बंद हो जाएगा। कौन भला है और कौन बुरा है इसका भी फर्क नहीं कर पाएगा तू।” किन्तु भारत के कान पर जूं तो क्या लीकें भी नहीं रेंगती। भौंहों में अंटे डालकर माँ  कहती है “इतनी ज्यादा सुविधाएं व्यक्ति के दिल- दिमाग को मुथरा कर देती हैं और तू तो विद्यार्थी है। “सुखार्थिनः कुतो विद्या, विद्यार्थिनः कुतः सुखम्। “अरे जिसने संघर्ष में जीवन झोंक दिया उसी के व्यक्तित्व पर शान चढ़ती है। वह शानदार कहलाता है।  देख भारत तेरा शरीर अदरक जैसा बढ़ता जा रहा है। यहां वहां से फैला जा रहा है। तलवार तो बहुत दूर की बात ढ़ाल उठा ले यही बहुत है। रोज अभ्यास किया कर। दुश्मन पर चीते सी चमक और बाज जैसी दृष्टि होनी चाहिए। तेरी तो दोनों चीजें ही जैसे जीभ बिरया रही हों मुझे।”  “माँ  देखो ऐसी बात मत किया करो। दुश्मन आएगा तब देखेंगे। मैं तो काजू-बादाम खा रहा हूं तो ताकत तो है ही न मुझ में।” भारत झल्लाता हुआ, अपनी थुलथुली बांह ऊपर करके बहुत कोशिश करके कसता हुआ दिखाता है।

बिस्तर पर मोबाइल और कुरकुरे के साथ लुढ़के हुए भारत को देखते से ही माँ  सिहर जाती है। “बेटा! पिछले साल से सबक लेकर उसी के प्रश्न उत्तर याद कर ले। तैयारी अच्छी कर ले।  योजना बनाकर अमल कर। समय सारणी बना।  उसी के अनुसार तैयारी कर। प्रत्येक विषय पर बराबर ध्यान देना। बड़ी कक्षा का विद्यार्थी है न तू तो बड़ा पाठ्यक्रम तो होगा ही।  हाँ, एक-एक विषय के प्रत्येक मुद्दे पर पकड़ अच्छी होनी चाहिए। अच्छी पकड़ तभी बनेगी जब समझ अच्छी होगी और अच्छी समझ अभ्यास से आती है। देख हमारी प्रकृति भी तो रोज नियमित रूप से अभ्यास करती है।

“करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात तें सिल पर परत निसान॥”

सुनते ही हाथ में रेजर पकड़ लेता है भारत और झल्लाता हुआ बोलता है, “हाँ, ठीक है माँ! अब मुझे अपनी दाढ़ी बना लेने दो और हां मेरी सबसे महंगी पोशाक निकाल देना।  आज ऑनलाइन पार्टी है दोस्तों के संग।”

माँ हताश होकर ऊपर की ओर देखकर कहती है,”हे ईश्वर! अब तू ही संभालना। मैं तो चुक गई। “ईश्वर भी सिंहासन पर विराजे मंद मंद मुसकुराते रहे।  क्या कर सकते हैं नियति है अपनी-अपनी।  पिछले एक वर्ष से माँ  और भारत की नजरें जैसे ही टकराती माँ  यही सब कहने लगती। माँ  को यह सब रट सा गया था और उसकी जीभ इस काम में पारंगत हो गई थी। दूसरी ओर भारत के कान इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि माँ  की बातें उसे रैप सॉन्ग जैसी सुनाई देने लगी थीं। मरी परीक्षाएं ऐसी थीं कि जितना पास जाओ एक कदम दूर हो जाती यह कहते हुए-नहीं नहीं, अभी नहीं, थोड़ा करो इंतजार। विद्यार्थियों के पेट में एक वर्ष से वही पाठ्यक्रम पढ़-पढ़ कर न केवल मरोड़ें उठने लगी थी बल्कि अब तो कब्ज़ हो गई थी कि आती है मगर आती नह। अब तो ईसबगोल की भूसी (ऑनलाइन परीक्षा) भी इस विद्यार्थी का भला न कर पाएगी।

माँ आँख में आँसू ला कर ऊपर देखते हुए प्रार्थना कर रही थी। हे ईश्वर! मेरे भारत की लाज रखना। उसे नीचा न देखना पड़े। कहीं नाक न कटा दे हम सबकी। आँसू अपने पल्ले से पोंछते हुए माँ  सब्जी काटने में व्यस्त हो जाती है। माँ तो आखिर माँ ही होती है।

- रश्मि चौधरी प्रभास

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