
वे समीक्षक हैं। प्रतिबद्ध भी। मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध। मूल्याधारित समीक्षा करते हैं। उनके अपने मूल्य हैं और अपना मूल्य भी। किसी के लिए खुद को सस्ता नहीं बनाते। दृढसंकल्पित हैं। हालांकि संकल्प बदलते रहते हैं। यह बदलाव ही उनकी दृढ़ता है। वे मानते हैं कि मूल्य मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य मूल्यों के लिए नहीं। पक्के मनुष्यतावादी हैं।
वे पिछले एक हफ्ते से एक अजीब दुविधा से घिरे हैं। दुविधा का कारण एक कवि का कविता संग्रह है, जो महीने भर पहले उन्हें मिला था। दो दिन में ही पढ़ लिया था। बेहतरीन कविताएँ। समीक्षा करने की सोच रहे हैं, पर मन और आत्मा के बीच अजब सा द्वंद्व चल रहा।
आत्मा––समीक्षा क्यों नहीं कर रहे इसकी?
मन––कोई तवज्जो नहीं दी इस कवि ने मुझे कभी। अच्छा लिखने का ये तो मतलब नहीं कि समीक्षक को चित्त में ही न दो। ये हिंदी है, इसमें आप केवल अच्छा लिखकर ही अपनी जगह नहीं बना सकते। लेखन से ज्यादा साधना लोगों को साधने में करनी पड़ती है। सम्पादकों, प्रकाशकों, समीक्षकों, पुरस्कार समिति के सदस्यों, संस्था अध्यक्षों, संयोजकों आदि आदि को बड़े जतन से साधना पड़ता है। इस साधने के बाद ही साहित्य साधना करनी होती है। यहाँ अकेले लेखन को साधने से कुछ नहीं होता।
इसने तो मुझसे भूमिका लिखने तक के लिए सम्पर्क नहीं किया।
आत्मा––यह जरूरी तो नहीं कि हर कोई तुमसे ही भूमिका लिखवाए?
मन––पर इसने तो मेरे विरोधी से भूमिका लिखवा ली। वो भी मैं सहन कर लेता, अगर फ्लैप ही मुझसे लिखवा लेता।
दोनों फ्लैप एकदम अनाड़ियों से लिखवाए। तुम्हें क्या पता मुझ पर क्या बीत रही है।
आत्मा––तुम भूमिका और फ्लैप छोड़कर कविताओं की समीक्षा कर दो।
समीक्षक को आत्मा के भोलेपन पर तरस आ रहा था। उसे अब आत्मा बोझ लगने लगी थी। ऐसी नासमझ आत्मा का भला कोई समझदार आदमी क्या करे? न ओढ़ने के काम की न बिछाने के।
उनकी गणना ऐसे चतुर समीक्षकों में की जाती थी जो अपने साहित्यिक मूल्यों के लिए आत्मा की बलि चढ़ाने में सँकोच नहीं करते थे।
समझदार आदमी लगातार उपेक्षा की अफीम खिलाकर आत्मा को सुला देता है।
वे कुछ तय नहीं कर पा रहे थे। उहापोह की स्थिति में थे।
तभी उनके फोन को घण्टी बजी।
"सर प्रणाम। अगले सप्ताह मेरे काव्यसंग्रह का विमोचन है। मैं चाहता हूँ कि वह आपके कर कमलों से हो (उन्होंने महसूस किया कि उनके हाथों का खुरदरापन कम होने लगा है।)
आपकी स्वीकृति आते ही आपकी सुविधानुसार तिथि और समय तय कर लिया जाएगा।
आपको फ़्लाइट से आना है।
आपके ठहरने की व्यवस्था फाइव स्टार होटल में रहेगी। आप अपने साथ किसी प्रिय व्यक्ति को भी ला सकते हैं। रखता हूँ सर। कल बात करता हूँ फिर से इसी समय। शुभरात्रि। प्रणाम।"
यह कवि का फोन था। समीक्षक की दुविधा दूर हो गई। देर रात तक जागकर उन्होंने करीब आठ-दस पेज की ऐसी धांसू समीक्षा सँग्रह की लिखी कि निराला, मुक्तिबोध, धूमिल शर्मिन्दा होने लगे।
-रामस्वरूप दीक्षित
सिद्ध बाबा कॉलोनी
टीकमगढ़ 472001
मो. 9981411097
रामस्वरूप दीक्षित : व्यंग्यकार का परिचय
हिंदी व्यंग्य में परसाई परंपरा के प्रतिनिधि व्यंग्यकारों में शुमार। विद्रूपताओं की गहरी समझ और उनके प्रखर और दुस्साहसी रचनात्मक प्रतिरोध के लिए जाने जाते हैं।
व्यंग्य और कविता में समान रूप से सक्रिय।
स्त्री जीवन की गहरी समझ। प्रेम कविताओं के लिए भी मशहूर।
दो व्यंग्य संग्रह और तीन कविता संग्रह प्रकाशित।
रचनाओं के पंजाबी, कन्नड़, मराठी, गुजराती, बुंदेली और अंग्रेजी में अनुवाद।
व्यंग्य संग्रह टांग खींचने की कला के लगातार तीन संस्करण प्रकाशित।
देश विदेश के अनेक मंचों से रचना पाठ।
समकालीन व्यंग्य समूह द्वारा साहित्यिक विमर्श और सामूहिक रचनात्मकता को बढ़ावा देने का प्रयास।
चर्चित पत्रिका व्यंग्य लोक का संपादन।