साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

धीरे-धीरे प्यार बन गई (काव्य)

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Author: नर्मदा प्रसाद खरे

जाने कब की देखा-देखी, धीरे-धीरे प्यार बन गई
लहर-लहर में चाँद हँसा तो लहर-लहर गलहार बन गई
स्वप्न संजोती सी वे आँखें, कुछ बोलीं, कुछ बोल न पायीं
मन-मधुकर की कोमल पाखें, कुछ खोली, कुछ खोल न पायीं
एक दिवस मुसकान-दूत जब प्रणय पत्रिका लेकर आया
ज्ञात नहीं, तब उस क्षण मैंने, क्या-क्या खोया, क्या-क्या पाया
क्षण भर की मुसकान तुम्हारी, जीवन का आधार बन गई।

अलकों के श्यामल मेघों में, शशि-मुख का छिप-छिप मुसकाना
कभी उलझना, कभी सुलझना, कभी स्वयं पर बलि-बलि जाना
मन चकोर ने अपलक देखा, अलक-पलक का रास रंगीला
एक दिवस बरबस आँखों ने किया अचानक आँचल गीला
नयनों की बरसात तुम्हारी, मेरे लिए बहार बन गई।

तुमने रूप संवारा अपना, मधुऋतु का शृंगार हो गया
तुमने वेश संवारा अपना, इन्द्रधनुष साकार हो गया
तुमने ज्यों ही गीत उठाया, कोकिल स्वर चुपचाप सो गया
अधरों के हिलते ही जैसे प्राणों का अभिसार हो गया
प्राण तुम्हारी गीत मधुरिमा दिशि-दिशि का विस्तार बन गई।

तुमने अपनी मांग भरी तो ऊषा को मुसकान मिल गई
प्राणों को, प्राणों की जैसे, युग-युग की पहचान मिल गई
तुमने तनिक निहारा हँस कर, फूल-फूल पर हास झर गया
कली-कली के नयन खुल गए, कन-कन में उल्लास भर गया
बहुत दिनों की दूरी पल में, अरे मिल त्यौहार बन गई।

तुमने हँस कर बाह गही तो जीवन को विश्वास मिल गया
गमक उठी जीवन फुलवारी, प्राणों को मधुमास मिल गया
तम को छोड़, दूर मंजिल पर, आशाओं के दीप जल उठे
साँस-साँस सोपान बन गई, स्वयं लक्ष्य के द्वार खुल उठे
सिन्धु बिन्दु बन गया सहज ही,लहर-लहर पतवार बन गई।

-नर्मदा प्रसाद खरे
[1964 में आकाशवाणी, भोपाल से प्रसारित]

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