8 अगस्त को सिंगापुर में लगभग 400 दर्शकों से खचाखच भरे सभागार में ‘टीम आहिस्ता आहिस्ता’ ने अपने कार्यक्रम ‘पहचान’ के माध्यम से कविता, कहानी, संगीत और स्मृतियों की ऐसी भावपूर्ण शाम सजाई, जिसने हर दिल को अपनी मिट्टी से जोड़ दिया। भारतीय उच्चायोग, सिंगापुर के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, जड़ों और पहचान का उत्सव मनाया गया तथा वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने का गौरव भी साझा किया गया।

टीम आहिस्ता आहिस्ता चार पेशे से अलग पर माटी से  एक विनोद कुमार दूबे, रत्नेश पांडेय, शांति प्रकाश उपाध्याय और अमितेश कुमार का समूह है। उत्तर प्रदेश और बिहार की धरती से जुड़े ये सभी साथी आज सिंगापुर में विभिन्न क्षेत्रों—शिपिंग, बैंकिंग और सिंगापुर सरकार की एजेंसी NParks—में अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारियाँ निभा रहे हैं। हिंदी, कविता, कहानी और संगीत के प्रति अपने साझा प्रेम ने इन्हें एक साथ आने और अपनी स्मृतियों, अनुभवों तथा सांस्कृतिक जड़ों को मंच देने की प्रेरणा दी।

इस समूह की एक विशेष खूबी है सिंगापुर के गिटारवादक और गायक अजीत गोपालकृष्णन। वे हिंदी नहीं बोलते, लेकिन हिंदी गीतों को जिस आत्मीयता और खूबसूरती से गाते और गिटार पर प्रस्तुत करते हैं, वह यह साबित करता है कि संगीत की कोई भाषा और संस्कृति की कोई सीमा नहीं होती।

सिंगापुर में दो पूरी तरह ‘सोल्ड आउट’ प्रस्तुतियों और मलेशिया में एक सफल कार्यक्रम के बाद ‘आहिस्ता आहिस्ता’ की ‘पहचान’ ने दर्शकों को घर, बचपन, परिवार, प्रवास और अपनी मिट्टी से जुड़ी स्मृतियों की भावनात्मक यात्रा कराई।

विनोद कुमार दुबे की ये पंक्तियाँ प्रवासी मन की उस दुविधा को सटीक स्वर देती हैं—

“वहाँ भी हम नहीं, पूरे यहाँ अब तक आभासी हैं,
कहीं का जन्म है अपना, कहीं के हम प्रवासी हैं।”

दो दुनियाओं के बीच जीते हुए भी दोनों को अपने भीतर सँजोए रखने की पीड़ा और अपनापन इन पंक्तियों में सहज ही उतर आता है।

शांति प्रकाश उपाध्याय ने इस शाम की आत्मा को मानो शब्द दे दिए—

“कहीं भी हूँ परछाई बन कर
तू मेरे साथ रहता है,
बदल दूँ पासपोर्ट फिर भी
तू हरदम याद रहता है।”

ये पंक्तियाँ बताती हैं कि पहचान केवल पासपोर्ट या पते से तय नहीं होती। देश बदल सकता है, नागरिकता बदल सकती है, लेकिन अपनी मिट्टी की स्मृतियाँ मनुष्य के भीतर हमेशा जीवित रहती हैं।

रत्नेश पांडेय ने अपने काव्य के माध्यम से दर्शकों को पुराने घर की ओर लौटा दिया—

“वो पुराने घर का कोना,
जहाँ यह जीवन जा मिलता है स्मृतियों से…
वो भूरा कोट और दीवार पर टंगा छाता,
ये बस पुरानी चीज़ें नहीं, जीवन धारा का हिस्सा हैं।
ये मेरे बाप-दादा का क़िस्सा है,
ये घर मेरी पहचान का हिस्सा है।”

पुराना घर, दीवार पर टंगा छाता, भूरा कोट ये वस्तुएँ केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों और जीवन की निरंतरता के प्रतीक बन जाती हैं। करियर, अवसर और बेहतर जीवन की तलाश में घर से दूर निकल आए प्रवासी के लिए ये स्मृतियाँ ही उसे अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं।

अमितेश कुमार की प्रस्तुति ‘हाँ, मैं बिहारी हूँ’ ने पूरे सभागार में नई ऊर्जा भर दी। बिहार की मिट्टी, अपनी पहचान और अपनेपन पर उनका गर्व दर्शकों से सीधे जुड़ गया ।

संगीत ने इस भावपूर्ण शाम को और भी समृद्ध किया। अजीत गोपालकृष्णन के मधुर गीतों और गिटार की धुनों ने वातावरण को भावनाओं से भर दिया। उनकी प्रस्तुति इस बात का सुंदर उदाहरण बनी कि संगीत दिलों को जोड़ता है और भाषा की सीमाओं को सहज ही पार कर जाता है।

सिंगापुर से मलेशिया तक ‘पहचान’ की यात्रा

सिंगापुर की शानदार सफलता के बाद अब ‘टीम आहिस्ता आहिस्ता’ एक और पड़ाव की ओर बढ़ रही है। भारतीय उच्चायोग, मलेशिया के आमंत्रण पर टीम 16 अगस्त को मलेशिया में अपनी प्रस्तुति देगी। भारत के स्वतंत्रता दिवस तथा वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम भी पूरी तरह सोल्ड आउट हो चुका है।

टीम को मिल रही यह प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं  कि कविता, कहानी, संगीत और स्मृतियों की भाषा सीमाओं से परे जाकर लोगों के दिलों को छूती है। चार पेशेवरों के एक छोटे-से समूह से शुरू हुई यह पहल अब भारतीय संस्कृति और प्रवासी अनुभवों को जोड़ने वाला एक सशक्त सांस्कृतिक मंच बनती जा रही है।

सिंगापुर में ‘टीम आहिस्ता आहिस्ता’ के कार्यक्रमों की सफलता के पीछे विभिन्न संगठनों और भारतीय समुदाय के अनेक सदस्यों का निरंतर सहयोग और प्रोत्साहन भी महत्वपूर्ण रहा है। उनके समर्थन ने भाषा, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक स्मृतियों को एक मंच पर लाने और अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘पहचान’ केवल एक मंचीय कार्यक्रम नहीं था। यह उस यात्रा का उत्सव था कि हम कहाँ से आए हैं, अपने साथ क्या लेकर आए हैं और हजारों किलोमीटर दूर रहने के बावजूद कौन-सी डोर हमें आज भी अपने घर से जोड़े रखती है।

[सिंगापुर से रिपोर्ट]