जब आसमान में जगते हैं नौ तारे: मातारिकी (Matariki) की कहानी
न्यूज़ीलैंड का वह त्योहार, जिसने सितारों को कैलेंडर बना दिया — और भारत के कृत्तिका नक्षत्र से जुड़ा एक अनोखा रिश्ता

सर्दियों की एक ठंडी सुबह, अभी सूरज उगा भी नहीं है। न्यूज़ीलैंड के किसी पार्क, समुद्र किनारे या मराए (marae) में लोगों की भीड़ जुटी है — कंबल ओढ़े, गर्म पेय हाथों में लिए, निगाहें उत्तर-पूर्वी क्षितिज पर टिकी हुई। सब एक चीज़ का इंतज़ार कर रहे हैं: तारों के एक छोटे-से झुरमुट का पहली बार दिखना। जैसे ही वह झिलमिलाता समूह क्षितिज के ऊपर उभरता है, कोई कराकिया (karakia/प्रार्थना) शुरू करता है, कहीं दूर पतंगें आसमान में तैरने लगती हैं। यह है मातारिकी (Matariki) — न सिर्फ एक तारा-समूह, बल्कि एक पूरी संस्कृति का नया साल।

दिलचस्प बात यह है कि यही आकाशीय दृश्य हज़ारों किलोमीटर दूर भारत में भी सदियों से देखा और पूजा जाता रहा है — जहाँ इसे कृत्तिका नक्षत्र के नाम से जाना जाता है।

तारों में बसा एक पूरा साल

पश्चिमी खगोल विज्ञान इसे "प्लीएड्स" या "सेवन सिस्टर्स" कहता है, वृषभ तारामंडल में चमकता एक तारा-गुच्छ। माओरी परंपरा में यही समूह मातारिकी (Matariki) कहलाता है, और इसमें सात नहीं, पूरे नौ तारे गिने जाते हैं। ठीक उसी वृषभ राशि में भारतीय ज्योतिष इसी समूह को कृत्तिका नक्षत्र के रूप में पहचानता है — 27 नक्षत्रों में तीसरा नक्षत्र, जिसके स्वामी ग्रह सूर्य और अधिष्ठाता देवता अग्नि माने गए हैं।

जब मध्य-सर्दियों में मातारिकी समूह महीनों की अनुपस्थिति के बाद पहली बार भोर से ठीक पहले क्षितिज पर झलकता है — जिसे खगोलशास्त्री "हेलियाकल राइज़" कहते हैं — तो यही पल सदियों से माओरी नव वर्ष की शुरुआत का संकेत रहा है। यह पल सिर्फ खगोलीय घटना नहीं, बल्कि मरामताका (maramataka) का हिस्सा है — वह पारंपरिक चंद्र-तारा कैलेंडर जो कभी रोपाई, कटाई, मछली पकड़ने और सामुदायिक जीवन की लय तय करता था। भारत में भी नक्षत्र-प्रणाली ठीक इसी तरह पंचांग, मुहूर्त और कृषि-चक्र का आधार रही है — दो अलग सभ्यताओं ने एक ही तारा-समूह में समय नापने का एक जैसा तरीक़ा खोज निकाला।

तीन धागे, एक उत्सव
मातारिकी को मनाने के पीछे तीन गहरे भाव जुड़े हैं, जो एक-दूसरे में गुँथे हुए हैं:

स्मरण — हेरेंगा (Herenga) — पिछले साल जिन अपनों को खोया, उन्हें याद करना। माना जाता है कि मातारिकी के तारे मृतकों की आत्माओं को अपने साथ ले जाते हैं, और इस तरह जीवित लोग अपने पूर्वजों — तूपुना (tūpuna) — से जुड़े रहते हैं।
उत्सव — तोहातोहा (Tohatoha) — फसल के लिए धन्यवाद देना, धरती और समुद्र की उदारता का जश्न मनाना, और भोजन बाँटना।
योजना और आकांक्षा — तूमनाको (Tūmanako) — आने वाले साल की ओर देखना, नए लक्ष्य बुनना और उन्हें तारों को समर्पित करना।
याद रखना, उत्सव मनाना, और आगे की सोचना — यही तीन धागे मातारिकी को सिर्फ एक छुट्टी से कहीं ज़्यादा बना देते हैं।

नौ तारे, नौ ज़िम्मेदारियाँ
माओरी परंपरा में मातारिकी समूह का हर तारा प्रकृति और जीवन के किसी एक पहलू का प्रतिनिधित्व करता है:

मातारिकी (Matariki): पर्यावरण, लोगों और भूमि का स्वास्थ्य-कल्याण
पोहुतुकावा (Pōhutukawa): मृतक — जिन्हें दिवंगत आत्माएँ समर्पित होती हैं
तुपुआनुकु (Tupuānuku): जमीन से उगने वाला भोजन (कुमारा, जड़ वाली सब्ज़ियाँ)
तुपुआरांगी (Tupuārangi):  ऊपर से मिलने वाला भोजन (फल, जामुन, पक्षी)
वाइती (Waitī): मीठे पानी के स्रोत और उनके प्राणी
वाइता (Waitā): खारे पानी, समुद्र और समुद्री भोजन
वाइपुना-आ-रांगी (Waipuna-ā-Rangi): बारिश और आसमान से गिरता पानी
उरुरांगी (Ururangi): हवाएँ
हीवा-इ-ते-रांगी (Hiwa-i-te-rangi): लक्ष्य, आकांक्षाएँ और इच्छाओं की पूर्ति

भारतीय पौराणिक परंपरा में भी इसी तारा-समूह को व्यक्तित्व दिया गया है — कृत्तिकाओं को छह (कहीं-कहीं सात) देवियाँ माना जाता है, जिन्होंने भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का पालन-पोषण किया था। यहीं से "कार्तिकेय" नाम भी कृत्तिकाओं से जुड़ा बताया जाता है। कृत्तिका का प्रतीक चिह्न छुरा या आरी है, जो तीक्ष्णता, शुद्धिकरण और अग्नि-तत्व का भाव दर्शाता है — और यह दिलचस्प है कि मातारिकी समारोहों में भी अलाव जलाना एक पुरानी परंपरा रही है। दो बिल्कुल अलग संस्कृतियों ने एक ही आकाशीय समूह में अग्नि, ऊर्जा और पूर्वजों से जुड़ाव देखा।

चालीस साल में पहला नया अवकाश
24 जून 2022 को मातारिकी ने न्यूज़ीलैंड में इतिहास रचा था— यह देश का पहला आधिकारिक सार्वजनिक अवकाश बना जो एक स्वदेशी खगोलीय पंचांग पर आधारित हो, और दुनिया में भी अपनी तरह का पहला। यह भी उल्लेखनीय है कि 40 से अधिक वर्षों में न्यूज़ीलैंड को मिली यह पहली नई सार्वजनिक छुट्टी थी। मातारीकी से पहले न्यूज़ीलैंड में घोषित किया गया आखिरी राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश वायतांगी डे (Waitangi Day) था, जिसे 1974 में सार्वजनिक अवकाश के रूप में लागू किया गया था।

मातारिकी की यह उपलब्धि रातोंरात नहीं आई। यह माओरी समुदायों और संगठनों की वर्षों लंबी वकालत का नतीजा थी, और आख़िरकार  सार्वजनिक अवकाश अधिनियम 2022 (Te Kāhui o Matariki Public Holiday Act 2022) के ज़रिए संसद में दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर पारित हुई — माओरी संस्कृति और वैतांगी संधि की साझेदारी की एक व्यापक स्वीकृति के रूप में।

तारीख हर साल क्यों बदलती है?
यहाँ एक दिलचस्प बात है — मातारिकी हमेशा शुक्रवार को पड़ता है, लेकिन कौन-सा शुक्रवार, यह साल-दर-साल कई हफ़्तों तक बदल सकता है। क्यों? क्योंकि तारीख किसी तय सूत्र से नहीं, बल्कि तारों की असली खगोलीय गति से तय होती है — मातारिकी समूह के हेलियाकल राइज़ से। हर साल मातारिकी सलाहकार समिति (Te Kāhui o Matariki) पारंपरिक मरामताका ढाँचे का उपयोग करके यह तारीख पहले से घोषित करती है।

अगले वर्ष 2027 में यह  शुक्रवार, 25 जून को होगी। आमतौर पर यह जून के अंत या जुलाई में ही कहीं पड़ता है — कुछ हद तक वैसे ही जैसे भारतीय पंचांग में कृत्तिका से जुड़े पर्वों की तारीखें चंद्र-कैलेंडर के हिसाब से हर साल बदलती हैं।

उस दिन शहर में क्या खुला, क्या बंद?
बैंक, सरकारी दफ़्तर और NZ पोस्ट बंद रहते हैं, लेकिन ज़्यादातर सुपरमार्केट, कैफे-रेस्तराँ (सार्वजनिक अवकाश अधिभार के साथ) और पब-बार खुले मिलते हैं। सार्वजनिक परिवहन सीमित समय-सारिणी पर चलता है — हालाँकि भोर के तारा-दर्शन कार्यक्रमों के लिए अक्सर विशेष शुरुआती सेवाएँ जोड़ी जाती हैं।

अवकाश अधिनियम 2003 के तहत कर्मचारियों को इस दिन का पूरा भुगतान मिलता है, यदि यह उनके लिए सामान्य कार्यदिवस होता है। यदि किसी को काम करना पड़े, तो उसे कम-से-कम डेढ़ गुना वेतन और साथ में एक अतिरिक्त सवेतन अवकाश मिलना चाहिए — और बिना कर्मचारी की सहमति के कोई नियोक्ता उसे इस दिन काम पर नहीं बुला सकता।

पतंगों से लेकर तारा-दर्शन तक: कैसे मनाया जाता है यह पर्व
आसमान में सबसे मनमोहक नज़ारा होता है मानु आउटे (manu aute) — पारंपरिक पतंगों का उड़ना। मान्यता है कि ये पतंगें मृतकों के नाम और यादों को तारों तक, ख़ासकर पोहुतुकावा (Pōhutukawa) तक, पहुँचाती हैं। न्यूज़ीलैंड भर के पार्कों और खुले मैदानों में सामूहिक पतंग-उत्सव आयोजित होते हैं।

रातों को वेधशालाओं, मराए (marae) और खुले स्थानों पर तारा-दर्शन कार्यक्रम सजते हैं, जहाँ लोग प्लीएड्स समूह को निहारते हैं और माओरी खगोल विज्ञान की गहराइयों में उतरते हैं। स्कूल, पुस्तकालय और सामुदायिक संस्थाएँ वानांगा (wānanga) — यानी सीखने के सत्र — आयोजित करती हैं।

और परंपरा यहीं नहीं रुकती — मातारिकी का उदय कभी कुमरा (kūmara), यानी शकरकंद, बोने का संकेत भी होता था, जो पुराने माओरी समाज की सबसे अहम फ़सल थी। आज भी माराए और सामुदायिक बगीचों में सामूहिक रोपाई के दिन इस परंपरा को ज़िंदा रखते हैं। इसके साथ काई (kai, भोजन) उत्सव, अलाव जलाना, महत्वपूर्ण स्थलों की हीकोई (hikoi, पैदल यात्राएँ), और औपचारिक कराकिया (karakia) — सब मिलकर इस पर्व को पूरा करते हैं।

माओरी मातारिकी और भारतीय कृत्तिका नक्षत्र

भारत में भी कृत्तिका नक्षत्र से जुड़े दिन — जैसे कार्तिक मास के व्रत-त्योहार — दीप जलाने, पूर्वजों का स्मरण करने और नई फ़सल के उत्सव से जुड़े रहे हैं। दोनों परंपराओं में यह समानता महज़ संयोग नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि आकाश हमेशा से मनुष्य के लिए एक साझा कैलेंडर और साझा कथा रहा है।

अगर आप माओरी नहीं हैं, तो भी शामिल हो सकते हैं
मातारिकी सिर्फ़ एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे न्यूज़ीलैंड की छुट्टी है। हर कोई — चाहे वह माओरी हो या न हो — इसमें दिल खोलकर शामिल हो सकता है। कैसे?

किसी पार्क, समुद्र-तट या वेधशाला में सामुदायिक तारा-दर्शन कार्यक्रम में जाएँ
वेलिंगटन के ते पापा टोंगारेवा (Te Papa Tongarewa) जैसे संग्रहालयों की मातारिकी प्रदर्शनियाँ देखें
सामुदायिक पतंग-उड़ान उत्सव में हिस्सा लें
माओरी खगोल विज्ञान पर किसी वानांगा (wānanga) में बैठें
और सबसे ज़रूरी — बस थोड़ा ठहरकर सोचें: स्मरण, उत्सव और योजना — इन तीन भावों का आपके अपने जीवन में क्या मतलब है?
कई मराए (marae) जनता के लिए अपने द्वार खोलते हैं। जिज्ञासा और सम्मान के साथ आना — यही वह भावना है, जिसके साथ यह त्योहार बाँटने के लिए रचा गया था।

जब अगली बार सर्दियों की किसी सुबह आपको आसमान में तारों का एक झिलमिलाता झुंड नज़र आए — चाहे आप उसे मातारिकी कहें या कृत्तिका — तो याद रखिएगा: वह सिर्फ रोशनी के बिंदु नहीं, बल्कि हज़ारों सालों से दुनिया के अलग-अलग कोनों में जीवित एक साझा परंपरा है, जो आज भी हर साल नए सिरे से उदय होती है।

-रो॰ कु॰ 
[भारत-दर्शन]