भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

त्रिलोक सिंह ठकुरेला साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 9

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

ऐसा वर दो 

भगवन् हमको ऐसा वर दो।
जग के सारे सद्गुण भर दो॥
हम फूलों जैसे मुस्कायें,
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कठपुतली

ठुमक-ठुमक नाचे कठपुतली 
सबके मन को मोहे।
रंग बिरंगे सुन्दर कपड़े 
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पापा, मुझे पतंग दिला दो

पापा, मुझे पतंग दिला दो,
भैया रोज उड़ाते हैं।
मुझे नहीं छूने देते हैं,
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला की मुकरियाँ

जब भी देखूं, आतप हरता।
मेरे मन में सपने भरता।
जादूगर है, डाले फंदा।
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलिया 

कुण्डलिया 
मोती बन जीवन जियो, या बन जाओ सीप।
जीवन उसका ही भला, जो जीता बन दीप।।
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चिड़िया

घर में आती जाती चिड़िया ।
सबके मन को भाती चिड़िया ।।
तिनके लेकर नीड़ बनाती ,
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जीवन में नव रंग भरो

सीना ताने खड़ा हिमालय,
कहता कभी न झुकना तुम।
झर झर झर झर बहता निर्झर,
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नई सदी के बच्चे

नई सदी के बच्चे हैं हम
मिलकर साथ चलेंगे।
प्रगति के रथ को हम मिलकर
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प्यारे बादल

देखो, माँ! नभ में आ पहुँचे, 
ये घनघोर सुघड़ बादल। 
इन्हें देखकर इतराई, झूमी, 
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला का जीवन परिचय (Biography)

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