रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 18
आशा का दीपक
वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से;
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थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से;
कृष्ण की चेतावनी -रश्मिरथी
हो गया पूर्ण अज्ञात वास,
पांडव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,
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पांडव लौटे वन से सहास,
पावक में कनक-सदृश तप कर,
कृष्ण की चेतावनी
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
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बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
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आदमी भी क्या अनोखा जीव है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
नये सुभाषित
पत्रकार
जोड़-तोड़ करने के पहले तथ्य समझ लो,
पत्रकार, क्या इतना भी तुम नहीं करोगे?
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जोड़-तोड़ करने के पहले तथ्य समझ लो,
पत्रकार, क्या इतना भी तुम नहीं करोगे?
कलम, आज उनकी जय बोल | कविता
जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
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चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
परशुराम की प्रतीक्षा
दो शब्द (प्रथम संस्करण)
इस संग्रह में कुल अठारह कविताएँ, जिनमें से पन्द्रह ऐसी हैं जो पहले किसी भी संग्रह में नहीं निकली थीं। केवल तीन रचनाएँ ‘सामधेनी' स?...
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इस संग्रह में कुल अठारह कविताएँ, जिनमें से पन्द्रह ऐसी हैं जो पहले किसी भी संग्रह में नहीं निकली थीं। केवल तीन रचनाएँ ‘सामधेनी' स?...
परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 1
गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ?
शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
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शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था,
चूहे की दिल्ली-यात्रा
चूहे ने यह कहा कि चुहिया! छाता और घड़ी दो,
लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो।
मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना,
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लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो।
मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना,
जनतंत्र का जन्म
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
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मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
नदियाँ और समुद्र
एक ऋषि थे, जिनका शिष्य तीर्थाटन करके बहुत दिनों के बाद वापस आया।
संध्या-समय हवन-कर्म से निवृत होकर जब गुरु और शिष्य, ज़रा आराम से, धूनी के आर-पार बैठे, तब गुर...
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संध्या-समय हवन-कर्म से निवृत होकर जब गुरु और शिष्य, ज़रा आराम से, धूनी के आर-पार बैठे, तब गुर...
परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 2
(खण्ड दो)
हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
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हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?
परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 3
(खण्ड तीन)
किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो ?
किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?
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किरिचों पर कोई नया स्वप्न ढोते हो ?
किस नयी फसल के बीज वीर ! बोते हो ?
लोहे के पेड़ हरे होंगे
लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,
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नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।
सिसकियों और चीत्कारों से, जितना भी हो आकाश भरा,