भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

कलम, आज उनकी जय बोल | कविता

कलम, आज उनकी जय बोल | रामधारी सिंह दिनकर की कविता | Poem by Ramdhari Singh Dinkar

जला अस्थियाँ बारी-बारी
चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल
कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे,
तूफ़ानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन,
मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

पीकर जिनकी लाल शिखाएं,
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी,
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

अंधा चकाचौंध का मारा,
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के,
सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल।

- रामधारी सिंह 'दिनकर'

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 1

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m v r rao raomvr1@rediffmail.com
23-Jul-2015 16:12
बहुत ही अच्छा लगा भारत दर्शन का ये नया रूप. आशा है कि आने वाले समय में इसका रूप और निखर कर सामने आएगा .

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