भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

प्रेम जनमेजय साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 3

प्रेम जनमेजय

मेरे व्यंग्य लेखन की राह बदलने वाले

उस उम्र में ‘आयुबाध्य' प्रेम के साथ-साथ मुबईया फिल्मों का प्रेम भी संग-संग पींग बढ़ाता था। पता नहीं कि फिल्मों के कारण मन में प्रेम का अंकुर फूटता था या म...
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कबीरा क्यों खड़ा बाजार

संपादक ने फोन पर कहा- कबीरा खड़ा बाजार में।
मैने पूछा – मॉस्क के साथ या बिना मॉस्क के?
संपादक कबीरी शैली में बोला-कबीर ने तो दूसरों के मास्क उतारे हैं, वो क...
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आपात्काल में अकाल | कविता

(श्री नागार्जुन से क्षमा-याचना सहित)
बहुत दिनों तक जनता रोई
संसद रही उदास
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प्रेम जनमेजय का जीवन परिचय (Biography)

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