महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 11
बिंदा
भीत-सी आंखों वाली उस दुर्बल, छोटी और अपने-आप ही सिमटी-सी बालिका पर दृष्टि डाल कर मैंने सामने बैठे सज्जन को, उनका भरा हुआ प्रवेशपत्र लौटाते हुए कहा- 'आपने आय?...
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चीनी भाई
मुझे चीनियों में पहचान कर स्मरण रखने योग्य विभिन्नता कम मिलती है। कुछ समतल मुख एक ही साँचे में ढले से जान पड़ते हैं और उनकी एकरसता दूर करने वाली, वस्त्र प?...
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गिल्लू | महादेवी वर्मा की कहानी
सोनजुही में आज एक पीली कली लगी है। इसे देखकर अनायास ही उस छोटे जीव का स्मरण हो आया, जो इस लता की सघन हरीतिमा में छिपकर बैठता था और फिर मेरे निकट पहुँचते ही क?...
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जो तुम आ जाते एक बार | कविता
कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
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पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
मैं नीर भरी दुःख की बदली | कविता
मैं नीर भरी दुःख की बदली,
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
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स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
श्री सूर्यकांतजी त्रिपाठी 'निराला'
एक युग बीत जाने पर भी मेरी स्मृति से एक घटाभरी अश्रुमुखी सावनी पूर्णिमा की रेखाएँ नहीं मिट सकी है। उन रेखाओं के उजले रंग न जाने किस व्यथा से गीले हैं कि अब ...
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प्रेमचंदजी
प्रेमचंदजी से मेरा प्रथम परिचय पत्र के द्वारा हुआ। तब मैं आठवीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी!। मेरी 'दीपक' शीर्षक एक कविता सम्भवत: 'चांद' में प्रकाशित हुई। प्?...
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मधुर-मधुर मेरे दीपक जल
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग, प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।
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युग-युग, प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर।
सब बुझे दीपक जला लूं
सब बुझे दीपक जला लूं
घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं!
क्षितिज कारा तोडकर अब
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घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं!
क्षितिज कारा तोडकर अब