मैं अमर शहीदों का चारण उनके गुण गाया करता हूँ जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,
आज लग रहा कैसा जी को कैसी आज घुटन है दिल बैठा सा जाता है, हर साँस आज उन्मन है बुझे बुझे मन पर ये कैसी बोझिलता भारी है
देते प्राणों का दान देश के हित शहीद पूजा की सच्ची विधि वे ही अपनाते हैं, हम पूजा के हित थाल सजाते फूलों का
अपने गीतों से गंध बिखेरूँ मैं कैसे मैं फूल नहीं काँटे अनियारे लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ मँझधार, भँवर, तूफान प्रबल
कहो नहीं करके दिखलाओ उपदेशों से काम न होगा जो उपदिष्ट वही अपनाओ
चन्द्रशेखर नाम, सूरज का प्रखर उत्ताप हूँ मैं, फूटते ज्वाला-मुखी-सा, क्रांति का उद्घोष हूँ मैं। कोश जख्मों का, लगे इतिहास के जो वक्ष पर है,