चमकीले पीले रंगों में अब डूब रही होगी धरती, खेतों खेतों फूली होगी सरसों, हँसती होगी धरती! पंचमी आज, ढलते जाड़ों की इस ढलती दोपहरी में
जो समर में हो गए अमर, मैं उनकी याद में गा रही हूँ आज श्रद्धा-गीत धन्यवाद में जो समर में हो गए अमर ...
हिन्दुअन की हिन्दुआई देखी तुरकन की तुरकाई ! सदियों रहे साथ, पर दोनों
मक्का के पीले आटे-सी धूप ढल रही साँझ की! देवालय में शंख बज उठा,
घडी-घड़ी गिन, घड़ी देखते काट रहा हूँ जीवन के दिन क्या सांसों को ढोते-ढोते ही बीतेंगे जीवन के दिन? सोते जगते, स्वप्न देखते रातें तो कट भी जाती हैं,