कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।

मोहब्बत

मोहब्बत | Hindi Short Story by Vishnu Prabhakar

गांव के प्राइमरी स्कूल में वह मेरा सहपाठी था। मेरी उसके साथ विशेष रूप से छनती हो, ऐसा नहीं था। फिर भी एकाएक वह घटना घट गयी। ईद का दिन था। उस गांव में ऐसा रिवाज था कि उस दिन हिन्दू लोग अपनी गाय-भैंसों का दूध मुसलमानों में बांट देते थे। बहुत सबेरे यह काम समाप्त हो जाता था। हमारी गाय-भैंसों का दूध भी उस दिन बंट चुका था। तभी मैंने देखा, मेरा वह सहपाठी लोटा लिये चला आ रहा है। लोटा खाली थी। मैंने पूछा, "तुम्हें दूध नहीं मिला?"

उसने उत्तर दिया, "मुझे आने में देर हो गई। दूध सब बंट गया?"

सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मन में करुणा-सी पैदा हुई। करुणा तो उसे अब कहता हूँ, तब की उस अनुभूति को शब्द नहीं दे सकता। उम्र भी तो हम दोनों की यही नौ एक साल की रही होगी। उस पर वह बहुत गरीब था। मैंने कहा, "जरा रुको।"

और मैं भागा-भागा अन्दर गया। अपनी माँ से सारी बातें कहीं। कहते-कहते स्वर कुछ भीग आया शायद। माँ ने मेरी ओर देखा। बोली, "दूध तो बेटा सब खत्म हो गया। तुम दोनों भाइयों के लिए बचा रखा है। बस..."

मैंने बिना सोचे तुरन्त कहा, "वही दे दो।"

माँ ने एक बार फिर मेरी ओर देखा। कुछ कहा भी, लेकिन अन्ततः वह दूध हमने सईद को दे दिया। वह खुशी-खुशी चला गया। बात यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी, लेकिन जैसा कि रिवाज है मुसलमान मित्र उस दिन सिवैयां बनाते हैं और अपने सब रिश्तेदारों और दोस्तों में बांटते हैं। दोपहर को देखा कि सईद फिर हमारे दरवाजे पर खड़ा है। मैंने पूछा, "क्या बात है सईद?"

उसने भोलेपन से जवाब दिया, "सिवैयां बनायी थीं न, तुम्हारे लिए लाया हूँ।" मेरे चाचा पास ही खड़े थे। वे मुस्कराये। बोले, "तुम्हारे घर की सिवैयां क्या हम खा सकते हैं? किसने दी हैं?"
माँ भी वहीं खड़ी थी। वह समझ गयी। बोली, "बेटे, हम लोग तुम्हारी पकायी हुई सिवैयां नहीं खा सकते। तुम बहुत अच्छे हो। इन्हें वापिस ले जाओ।"

सईद की कुछ समझ में नहीं आया। वह कभी मेरी ओर देखता, कभी मेरी माँ की ओर। माँ ने उसे फिर प्यार से समझाया। अनबूझ-सा वह जाने के लिए मुड़ा, लेकिन न जाने क्या हुआ, कटोरा उसके हाथ से वहीं गिर पड़ा और सिवैयां चारों ओर बिखर गयीं।

हठात् मैंने सईद की ओर देखा। मुझे लगा वे सिवैयां नही थीं, इन्सान की मोहब्बत थी जो मेरे दरवाजे पर पैरों से रौंदे जाने के लिए बिखरी पड़ी थी।

-विष्णु प्रभाकर 

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