यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

कोई फिर कैसे.... | ग़ज़ल

रचनाकार: कुँअर बेचैन
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कोई फिर कैसे | कुअँर बेचैन की ग़ज़ल | Ghazal by Kunwar Bechain

कोई फिर कैसे किसी शख़्स की पहचान करे
सूरतें सारी नकाबों में सफ़र करती हैं

अच्छे इंसान ही घाटे में रहे हैं अक्सर
वो हैं चीजें जो मुनाफ़ों मे सफर करती हैं

क्या पता बीच मे छलके कि लबो तक पहुँचे
ये शराबें जो गिलासो में सफ़र करती हैं

जो किसी के भी चुभी हो तो हमे बतलाएँ
खुशबुएँ रोज ही काँटो मे सफ़र करती हैं

सिर्फ़ मेरा ही नही सबका यही कहना है
मंजिलें अच्छे इरादों मे सफ़र करती हैं

वो किसी एक की होकर के रहें नामुमकिन
सारी नदियाँ दो किनारों में सफ़र करती हैं

रोशनी दे के जमाने को, चला जाऊँगा
बातियाँ जैसे चराग़ों में सफ़र करती हैं

उसको बस मोम कहो ढल जो गया साँचों में
हस्तियाँ कब किन्हीं साँचों में सफ़र करती हैं

- कुअँर बेचैन

 

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