देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
एक छलावा | कविता
बापू!
तुम मानव तो नहीं थे
एक छलावा थे
कर दिया था तुमने जादू
हम सब पर
स्थावर-जंगम, जड़-चेतन पर
तुम गए—
तुम्हारा जादू भी गया
और हो गया
एक बार फिर
नंगा।
यह बेईमान
भारती इनसान।
--विष्णु प्रभाकर
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