भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

अपनी छत को | ग़ज़ल

अपनी छत को | Hindi Ghazal by V. K. Singhal

अपनी छत को उनके महलों की मीनारें निगल गयीं
धूप हमारे हिस्से की ऊँची  दीवारें निगल गयीं

अपने पाँवों  के छालों के नीचे हैं ज़ख्मी  फुटपाथ
शानदार सड़कों को उनकी चौड़ी कारें निगल गयीं

क़त्ल हुए अरमान हमारे जुल्म के वहशी हाथों से
अपने सब अधिकारों को उनकी तलवारें निगल गयीं

किस पर करें भरोसा आखिर किस पर हम लाएँ ईमान  
जब हमको अपनी ही चुनी हुई सरकारें निगल गयीं

फूल देखते हैं नफरत से कलियां हँसी उड़ाती  हैं
शिकवा नहीं खिज़ाओं से कुछ हमें बहारें निगल गयीं

लोगों का पागलपन देखो तूफां को देते हैं दोष 
जब कश्ती को ऐन  किनारे पर पतवारें निगल गयीं

-विजय कुमार सिंघल

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