देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
नक्शानवीस | कविता
पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में
समय के अंतराल में
इन आतंकित गलियों में,
मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर
रूकता नहीं किसी दरवाजे के सामने
देखता नहीं घड़ी को
सुनता नहीं किसी पुकार को,
बदलती हुई सीमाओँ के भूगोल में
मेरा भय ही मेरे साथ है
- मोहन राणा
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