अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

मुझको अपने बीते कल में | ग़ज़ल

मुझको अपने बीते कल में, कोई दिलचस्पी नहीं
मैं जहाँ रहता था अब वो, घर नहीं बस्ती नहीं

सबके माथे पर शिकन, सबपर उदासी छाई है
अब किसी चेहरे पे दिखता, नूर औ’ मस्ती नहीं।

ना कोई अपना बना, हम भी किसी के कब बने  
इस जगह में जैसे अपनी, कुछ भी तो हस्ती नहीं

तुझसा जो भी हो गया, बस  भीड़ में ही खो गया 
शख्सियत ‘रोहित’ हमारी इतनी भी सस्ती  नहीं।

- रोहित कुमार 'हैप्पी'

 

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