हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी

लोकतंत्र का ड्रामा देख

विदुर से नीति नहीं
चाणक्य चरित्र कहां
कुर्सी पर जा बैठे हैं
शकुनी-से मामा देख

कान्हा धनकुबेरों की
कोठियों में छुप गए
रो रहा खड़ा बेचारा
गली में सुदामा देख

आपस में हाथापाई
संसद अखाड़ा बनी
रोजाना ही हो रहा है
हो-हल्ला हंगामा देख

जन गण मन...
अधिनायक की जय बोलें
धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र
का ड्रामा देख

- हलचल हरियाणवी
[हलचल हरियाणवी के चौके-छक्के, अर्पित प्रकाशन]

 

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