वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।

दो पल को ही गा लेने दो

दो पल को ही गा लेने दो।
गाकर मन बहला लेने दो !
कल तक तो मिट जाना ही है;
तन मन सब लुट जाना ही है ;
लेकिन लुटने से पहले तो--
अपना रंग जमा लेने दो ।
दो पल को ही गा लेने दो।
गाकर मन बहला लेने दो !

फूल खिलखिला कर हँसते हैं,
फिर तो काँटे ही धंसते हैं;
काँटों से पहले फूलों को---
कुछ शृंगार सजा लेने दो।
दो पल को ही गा लेने दो।
गाकर मन बहला लेने दो!

जीवन क्या है ? इक सपना है,
सपने में सब कुछ अपना है;
अपनेपन की इन घड़ियों में
लघु संसार बसा लेने दो।
दो पल को ही गा लेने दो।
गाकर मन बहला लेने दो!

-शिवशंकर वशिष्ठ
[गीली आँखें गीले गीत, 1958, दिल्ली पुस्तक सदन]

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