वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'।
बटोही, आज चले किस ओर?
नहीं क्या इसका तुमको ज्ञान,
कि है पथ यह कितना अनजान?
चले इस पर कितने ही धीर,
हुए चलते-चलते हैरान।
न पाया फिर भी इसका छोर।
चले हो अरे, आज किस ओर?
चले इस पर कितने ही संत,
किसी को मिला ना इसका अंत।
अलापा नेति-नेति का राग,
न पाया फिर भी इसका छोर।
चले हो अरे, आज किस ओर?
अरे, है अगम सत्य की शोध,
बुद्ध औ' राम कृष्ण से देव,
चले इस पद पर जीवन हार,
न पाया फिर भी इसका पार।
बटोही, साहस को झकझोर -
बढ़े जाते फिर भी उस ओर!
-भगवद्दत्त ‘शिशु'
[निर्झरिणी, नवयुग साहित्य सदन, इन्दौर, 1946]
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